राहुल गांधी अपने आधे-अधूरे एवं विध्वंसात्मक बयानों को लेकर निरन्तर चर्चा में रहते हैं. उनके बयान हास्यास्पद होने के साथ उद्देश्यहीन एवं उच्छृंखल भी होते हैं. राहुल ने बातों-बातों में यह भी कह दिया कि चीन ने हिंदुस्तान की जमीन पर अतिक्रमण कर लिया है.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी हिंदुस्तान में मोदी-विरोध में कुछ भी बोलें, यह राजनीति का हिस्सा हो सकता है, लेकिन वे विदेश की धरती पर मोदी विरोध के चलते जिस तरह के गलत बयान देते रहे हैं, वह उनकी सियासी अपरिपक्वता को ही दर्शाता है. आखिर कब राहुल एक उत्तरदायी एवं विवेकवान नेता बनेंगे? विदेश में कांग्रेस पार्टी की यात्राओं के माध्यम से वे पीएम नरेन्द्र मोदी की विश्वस्तरीय नेता की छवि को धुंधला कर स्वयं को उस स्तर का नेता साबित करने में जुटे हैं. जबकि मोदी की छवि एवं हस्ती, प्रसिद्धि एवं सर्वस्वीकार्यता विश्व के किसी भी नेता की तुलना में अधिक है. अन्य राष्ट्रों की बात दूर, वे अभी हिंदुस्तान में भी उत्तरदायी नेता नहीं बन पाये हैं. उनकी कार्यशैली एवं बयानबाजी में अभी भी बचकानापन एवं गैरजिम्मेदाराना रेट ही झलकता है. एक प्रांत में क्या जीत हासिल कर ली, अहंकार के शिखर पर चढ़ बैठे, निश्चित ही राहुल के विष-बुझे बयान इसी सियासी अहंकार से उपजे हैं.
इन दिनों अपनी अमेरिका की यात्रा में राहुल गांधी ने एक बार फिर पीएम मोदी और आरएसएस को आड़े हाथ लिया. केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए उन्होंने ये भी बोला कि राष्ट्र में आज मुस्लिम ही नहीं, सभी अल्पसंख्यक, दलित और आदिवासी डरा हुआ महसूस कर रहे हैं. इस तरह के बयानों से मोदी एवं आरएसएस से अधिक हिंदुस्तान की बदनामी हो रही है, लगता है राहुल गांधी मोदी विरोध के नाम पर राष्ट्र के विरोध पर उतर आए हैं. ये पहली बार नहीं है. लंदन की यात्रा के दौरान भी राहुल गांधी अपने बयानों से इसी तरह घिर गए थे. अमेरिका में उन्होंने केरल में अपने सहयोगी दल भारतीय यूनियन मुसलमान लीग को पंथनिरपेक्ष होने का प्रमाण पत्र देते हुए बोला कि उसमें कुछ भी गैर सेक्युलर नहीं है. इसका मतलब है कि उनकी नजर में वह पक्के तौर पर पंथनिरपेक्ष हैं. उनका यह बयान जीती मक्खी निगलने जैसा और पंथनिरपेक्षता का उपहास है. भारतीय यूनियन मुसलमान लीग के सांप्रदायिक चरित्र पर इस तरह की बातों से पर्दा पड़ने वाला नहीं है. वह जिन्ना की मुसलमान लीग से अलग नहीं है, क्योंकि सच यही है कि विभाजन के बाद उसका गठन जिन्ना के समर्थकों ने ही किया था. आखिर राहुल गांधी किस मुंह से ऐसे सांप्रदायिक और विभाजनकारी अतीत वाले दल को पंथनिरपेक्ष होने का प्रमाण पत्र दे रहे हैं? वे राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता को साम्प्रदायिक संकीर्णता से खण्डित करने की प्रयास करते हुए कब क्या कर जाएं, कहां नहीं जा सकता. आश्चर्य नहीं कि कल को वह बंगाल के घोर सांप्रदायिक और नफरती भारतीय सेक्युलर फ्रंट को भी पंथनिरपेक्ष होने का प्रमाण दे दें, क्योंकि कांग्रेस पार्टी ने पिछला विधानसभा चुनाव उसके साथ मिलकर ही लड़ा था. कांग्रेस पार्टी एवं उनके नेता राहुल का स्वभाव ऐसा हो गया है कि वे तिल को ताड़ एवं राई को पहाड़ बनाकर प्रस्तुति देते हैं, यह उनके दृष्टिकोण का गुनाह एवं अहंकार है. ‘डूंगर बलती दीखे, घर बलतो कोनीं दीखे’ इस कहावत के मुताबिक अपनी हरकतों एवं रसातल में जाते जन-बल से आंख मूंदकर दूसरे में गुनाह देखना कांग्रेस पार्टी का सहज स्वभाव हो गया है.
कांग्रेस की मुसलमान तुष्टिकरण की नीति आजादी मिल जाने एवं राष्ट्र के दो टुकड़े हो जाने के बावजूद कायम रही, इसीलिये बंटवारे के बाद कांग्रेस पार्टी के नेताओं के सांप्रदायिक सोच से नाराज होकर सरदार पटेल ने यह कहकर उन्हें चेताया था कि दो घोड़ों की सवारी मत कीजिए. एक घोड़ा चुन लीजिए और जो पाक जाना चाहते हैं, वे जा सकते हैं. सरदार पटेल ने यह कहने में भी संकोच नहीं किया था कि लीग के जो समर्थक महात्मा गांधी को अपना शत्रु नंबर एक बताते थे, वे अब उन्हें अपना दोस्त कह रहे हैं. भले ही संकीर्ण वोट बैंक की सस्ती राजनीति के चलते आज की कांग्रेस पार्टी यह सब याद न रखना चाहती हो, लेकिन राष्ट्र की जनता यह सब नहीं भूल सकती.
देश की जनता मोदी एवं राहुल के बीच के फर्क का महसूस कर रही है. जनता यह गहराई से देख रही है कि राहुल विदेशों में हिंदुस्तान की बढ़ती साख एवं विकास की तस्वीर को बट्टा लगा रहे हैं जबकि मोदी ने न सिर्फ अपनी गवर्नमेंट के दौरान हिंदुस्तान में आए बदलावों की सकारात्मक फोटोज़ विदेशी मंच पर पेश कीं, बल्कि दुनिया की समस्याओं को लेकर भी अपनी समाधानपरक सोच रखी. इसलिये उन्हें विश्व नेता के रूप में स्वीकार्यता मिल रही है. किन्हीं एक दो प्रांतों में हार की वजह से मोदी की छवि पर कोई असर नहीं पड़ा है, हिंदुस्तान ही नहीं, समूची दुनिया में मोदी के प्रति सम्मान एवं श्रद्धा का रेट निरन्तर प्रवर्द्धमान है. राहुल गांधी, उनके रणनीतिकारों और विदेशों में कांग्रेस पार्टी के संचालकों का नरेंद्र मोदी, बीजेपी और संघ परिवार के प्रति शाश्वत वैर-भाव एवं विरोध की राजनीति समझ में आती है लेकिन विदेश में राष्ट्र की खराब छवि पेश कर और नेता को खलनायक बनाने से उन्हें इज्जत नहीं मिलेगी. यह तो विरोध की हद है! नासमझी एवं सियासी अपरिपक्वता का शिखर है!! उजालों पर कालिख पोतने के कोशिश हैं!!!
राहुल गांधी अपने आधे-अधूरे एवं विध्वंसात्मक बयानों को लेकर निरन्तर चर्चा में रहते हैं. उनके बयान हास्यास्पद होने के साथ उद्देश्यहीन एवं उच्छृंखल भी होते हैं. राहुल ने बातों-बातों में यह भी कह दिया कि चीन ने हिंदुस्तान की जमीन पर अतिक्रमण कर लिया है. वह राष्ट्र के प्रमुख विपक्षी दल के नेता हैं. गवर्नमेंट की नीतियों से नाराज होना और गवर्नमेंट के कदमों पर प्रश्न उठाना उनके लिए महत्वपूर्ण है. सियासी रूप से यह उनका कर्तव्य भी है. लेकिन, प्रश्न यह है कि क्या विदेशी धरती पर वह मात्र हिंदुस्तान के विपक्षी दल के नेता होते हैं? क्या उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि वह हिंदुस्तान का भी अगुवाई कर रहे हैं? यह परेशानी मात्र राहुल गांधी की नहीं है. पूरा विपक्ष यह नहीं समझ पा रहा है कि सत्ताधारी दल के विरोध और राष्ट्र के विरोध के बीच फर्क है. सत्ताधारी दल का विरोध करना स्वाभाविक है, लेकिन उस लकीर को नहीं पार करना चाहिए, जिससे वह राष्ट्र का विरोध बन जाए. ऐसे बयानों से किस पर और कैसे असर पड़ता है. गवर्नमेंट और देश के विरोध के बीच अंतर समझना भी आवश्यक है. गौरतलब बात यह है कि निन्दक एवं आलोचक कांग्रेस पार्टी को सब कुछ गलत ही गलत दिखाई दे रहा है. मोदी एवं बीजेपी में कहीं आहट भी हो जाती है तो कांग्रेस पार्टी में भूकम्प-सा आ जाता है. यही नहीं, इन कांग्रेसी नेताओं को मोदी गवर्नमेंट की एक भी खासियत दिखाई नहीं देती, कितने ही कीर्तिमान स्थापित हुए हों, कितने ही आयाम उद्घाटित हुए हों, राष्ट्र की तरक्की की नयी इबारतें लिखी गयी हों, समूची दुनिया हिंदुस्तान की प्रशंसा कर रही हो, लेकिन इन कांग्रेसी नेताओं को सब काला ही काला दिखाई दे रहा है. कमियों को देखने के लिये सहस्राक्ष बनने वाले राहुल अच्छाई को देखने के लिये एकाक्ष भी नहीं बन सके? बनें भी तो कैसे? शरीर कितना ही सुन्दर क्यों न हो, मक्खियों को तो घाव ही अच्छा लगेगा. इसी प्रकार राहुल एवं कांग्रेस पार्टी को तो अच्छाइयों में भी बुराई का ही दर्शन होगा.
भारत जैसे सशक्त लोकतंत्र के लिये विवेकशील और जनता के मानस को समझने वाला विपक्ष चाहिए, यह लोकतंत्र के लिए आवश्यक है. लेकिन कांग्रेस पार्टी एवं राहुल विपक्ष की किरदार में खरा नहीं उतरे हैं, जबकि लोकतंत्र का तकाजा है कि जो विपक्ष में अपनी किरदार का सशक्त निर्वाह करता है वही सत्ता पर काबिज होने के योग्य है. यह बात राहुल को समझनी होगी. किंतु यदि विष-बुझे बयानों से एक खेमे की वाहवाही लूटने का प्रयत्न किया जाएगा, तो राहुल जनता से और अधिक कटते जाएंगे. राहुल को यह समझना होगा कि इस तरह हिंदुस्तान के जनमानस पर पकड़ नहीं बना पाएंगे. विदेश में चंद लोगों के सामने कुछ कह देने और बदले में चंद तालियां पा लेने से राष्ट्र का समर्थन नहीं मिलेगा. इस बात को राहुल जितनी शीघ्र समझ लें, उतना बेहतर. जनता को गुमराह करने के लिये और उनका मनोबल कमजोर एवं संकीर्ण करने के लिये कांग्रेस पार्टी उजालों पर कालिख पोत रही है, इससे उसी के हाथ काले होने की आसार है. इसकी बजाय वह अपनी शक्ति को स्वस्थ एवं साफ-सुथरी राजनीति करने में लगाये तो अपने सियासी धरातल को मजबूत कर पाएगी.