लखनऊ, 17 फरवरी (आईएएनएस). सर्च इंजन पर टेलीफोन नंबर खोजना सुविधाजनक लग सकता है, लेकिन बहुत से लोगों को यह एहसास नहीं है कि यह लुटेरों द्वारा बिछाया गया जाल हो सकता है. हाल की दो घटनाएं इस बात को साबित करती हैं.
पहले मुद्दे में, एक आदमी से 71,000 रुपये की ठगी की गई जब उसने एक हॉस्पिटल का नंबर खोजने के लिए इंटरनेट का उपयोग किया. उनकी पत्नी बीमार थीं और उन्होंने परामर्श के लिए नंबर पर कॉल किया. पीड़ित भगवानदीन को इंदिरानगर के एक चिकित्सक से परामर्श के लिए रोगी का पंजीकरण कराने के लिए टेलीफोन पे के माध्यम से 10 रुपये जमा करने के लिए बोला गया था.
चूंकि पीड़ित ने लुटेरे से बोला कि वह ऐप के माध्यम से भुगतान नहीं कर सकता, जिस पर लुटेरे ने उससे बैंक खाता संख्या साझा करने को कहा, जो उसने कर दिया. उसे क्विकसपोर्ट ऐप डाउनलोड करने और ऐप के जरिए 10 रुपये देने को बोला गया. थोड़ी देर बाद पीड़ित के रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर एक ओटीपी आया और लुटेरे ने उसे शेयर करने को कहा.
पीड़ित ने बताया, मुझे एक पंजीकरण संख्या दी गई थी और अगले दिन सुबह 10 बजे हॉस्पिटल जाकर चिकित्सक से परामर्श करने के लिए बोला गया था. हालांकि, जब मैं वहां पहुंचा, तो मुझे बताया गया कि हॉस्पिटल ने कोई अग्रिम पंजीकरण नहीं किया. पत्नी के भर्ती होने के बाद जब वह पैसे निकालने एटीएम गया तो पता चला कि उसके बैंक खाते से 71,755 रुपये निकल चुके हैं.
एसएचओ, इंदिरानगर, छत्रपाल सिंह ने बोला कि एक प्राथमिकी दर्ज की गई है और जांच के लिए साइबर सेल की सहायता मांगी गई है. एक अन्य मुद्दे में, छावनी के सदर क्षेत्र में एक प्रमुख दुकान से मिठाई खरीदने के नाम पर अमीनाबाद निवासी एक आदमी से 64,000 रुपये से अधिक की ठगी की गई.
पीड़ित अशोक कुमार बंसल ने दुकान का मोबाइल नंबर गूगल पर सर्च करने के बाद दुकान से मिठाई का औनलाइन ऑर्डर दिया. उन्होंने बोला कि टेलीफोन उठाने वाले आदमी ने उनसे भुगतान के लिए अपने बैंक खाते का ब्योरा मांगा.
बंसल ने कहा, मैंने ऑर्डर के लिए 64,110 रुपये का भुगतान किया था, लेकिन जब मैं ऑर्डर लेने दुकान पहुंचा तो मुझे पता चला कि मोबाइल नंबर फर्जी है और मुझे फर्जीवाड़ा का शिकार बनाया गया है.
साइबर सेल के पुलिस अधीक्षक त्रिवेणी सिंह ने बताया कि जब कोई यूजर इस तरह का (क्विक सपोर्ट) ऐप डाउनलोड करता है तो वह एप को सभी परमिशन दे देता है. ऐप में अन्य सभी ऐप्स, गैलरी और संपर्क सूचियों तक पहुंच शामिल है. इस अनुमति के साथ, लुटेरे टेलीफोन पर रिमोट एक्सेस लेते हैं. जब कोई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण रिमोट एक्सेस पर होता है, तो जिस आदमी ने रिमोट एक्सेस लिया है, वह सभी गतिविधियों को साफ तौर पर देख सकता है.
उन्होंने कहा, जबकि पीड़ित अपना नाम, नंबर भरने और सेवा शुल्क के रूप में 10 रुपये देने में व्यस्त है, लुटेरे पिन कोड देख सकते हैं, जिसका इस्तेमाल बाद में पैसे निकालने के लिए किया जाता है.