Bilawal Bhutto: पाक के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो हिंदुस्तान में होने वाले एससीओ समिट में भाग लेने के लिए हिंदुस्तान आ चुके हैं. हिंदुस्तान को गीदड़ भभकी देने वाले पाक के साथ ऐसा क्या हुआ कि अचानक विदेश मंत्री स्तर का आदमी हिंदुस्तान की यात्रा करता है. क्योंकि 12 वर्ष बाद ये पहला मौका है जब पड़ोसी राष्ट्र पाक को कोई विदेश मंत्री हिंदुस्तान की यात्रा पर है. इससे पहले 2011 में पाक की तत्कालीन विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार हिंदुस्तान के दौरे पर आईं थीं.
हालांकि भुट्टो की हिंदुस्तान यात्रा से पहले ही हिंदुस्तान के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने यह साफ कर दिया है कि पाक के साथ किसी भी स्तर की द्विपक्षीय वार्ता नहीं होगी. दरअसल, हिंदुस्तान और पाक के संबंध हाल के सालों में काफी तल्ख रहे हैं. इसकी बड़ी वजह भी पाक है. क्योंकि 2019 में पुलवामा अटैक करने के बाद पाक पर हिंदुस्तान ने जवाबी कार्रवाई की. बालाकोट जाकर एयरस्ट्राइक किया. इसके बाद से दोनों राष्ट्रों के संबंध तनावपूर्ण हो गए थे. इसके बाद हिंदुस्तान से संबंध और खराब तब हुए जब हिंदुस्तान ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटा दिया. तब से पाक ने हिंदुस्तान के साथ राजनयिक और व्यवसायी संबंध तोड़ लिए थे. इसका हालांकि हिंदुस्तान को कोई खास असर नहीं पड़ा. लेकिन पाक की कमर टूट गई. कंगाल पाक की आवाम स्वयं कह रही है कि यदि हिंदुस्तान से अच्छे संबंध होते तो आटा, और दूसरी मूलभूत आवश्यकताओं की वस्तुएं हिंदुस्तान से आ जातीं. लेकिन भूखों मरने वाले राष्ट्र पाक की इस हालत के पीछे भी पाक के हुक्मरान हैं.
बिलावल भुट्टो की हिंदुस्तान यात्रा के क्या हैं मायने?
1. कंगाल पाक पर अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक दबाव
पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ ने कुछ महीने पहले ही एक अरबी टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में हिंदुस्तान से वार्ता के लिए तैयार होने की बात कही थी. हिंदुस्तान से संबंध सुधारने के लिए उन्होंने बाकायदा संकेत दिए थे. लेकिन बाद में जब प्रेशर आया तो अपने बयान पर स्पष्टीकरण देने लगे थे. लेकिन पाक के मन में यह जरूर है कि यदि पाक की कंगाली हालत में यदि कोई काम आ सकता है तो वो स्वयं उसका पड़ोसी राष्ट्र हिंदुस्तान है. लेकिन जब स्वयं ही संबंध तोड़ रखें हों तो किस मुंह से संबंध सुधारने की बात कहें. ऐसे में जब एससीओ समिट के लिए समिट के प्रोटोकॉल के अनुसार पाक के विदेश मंत्री को न्योता दिया गया, तो उन्होंने आने में देर नहीं की. हालांकि हिना रब्बानी खार ने बिलावल की यात्रा से पहले यह लीपापोती करने की प्रयास की कि समिट के प्रोटोकॉल के अनुसार बहुपक्षीय वार्ता के कारण बिलावल समिट अटैंड करने हिंदुस्तान आ रहे हैं.
2. एससीओ समिट के प्रोटोकॉल से बंधा होना
विशेषज्ञों के मुताबिक इसका एक कारण यह भी है कि जब हिंदुस्तान और पाक ने 2017 में एससीओ ज्वाइन किया था, तब एक शर्त ये थी कि दोनों राष्ट्र द्विपक्षीय मुद्दों को अलग रखकर बहुपक्षीय भलाई देखेंगे और पाक उसी का पालन कर रहा है. जानकार कहते हैं कि दोनों ही राष्ट्र एससीओ को काफी महत्व देते हैं. पाक की विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मुमताज जहरा बलोच ने भी बिलावल भुट्टो के हिंदुस्तान आने की घोषणा करते हुए बोला था, ‘एससीओ की मीटिंग में शामिल होने का निर्णय ये दिखाता है कि पाक एससीओ के चार्टर को लेकर कितना प्रतिबद्ध है. इससे यह भी पता चलता है कि पाक अपनी विदेश नीति में इस क्षेत्र को कितनी अहमियत देता है.‘
3. एससीओ समिट में अपना भलाई ढूंढता है पाकिस्तान
एक और कारण यह है कि एससीओ से पाक के भलाई गहरे रूप से जुड़े हुए हैं. ऐसे में वह हिंदुस्तान के बुलावे के बावजूद बैठक का बहिष्कार करके विश्व समुदाय को अपनी नकारात्मक छवि नहीं पेश करना चाहता था. नहीं तो पाक जो कि पहले ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अलग थलग सा है, वह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में और अलग थलग होता.
4. चीन और रूस के समकक्षों से मुलाकात का मौका
पाकिस्तान को यह मालूम है कि एससीओ समिट के बहाने वह हिंदुस्तान से नहीं तो कम से कम चीन के विदेश मंत्री छिन कांग और रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से तो मुलाकात कर ही सकता है. इसलिए शहबाज गवर्नमेंट के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो हिंदुस्तान की यात्रा पर आए हैं.