रूस और यूक्रेन के युद्ध के बीच दोनों राष्ट्र एक-दूसरे पर जासूसी के आरोप लगाते रहे हैं. वर्ष भर से चल रहे इस युद्ध में दोनों राष्ट्रों ने कई ऐसी स्त्रियों को अरैस्ट किया; जिनपर जासूस होने के आरोप लगे.
रूस-यूक्रेन की जंग में स्त्री जासूसों की किरदार ने दूसरे विश्व युद्ध की एक खूबसूरत जासूस की याद दिलाई है. इस स्त्री के जासूस होने की बात किसी को पता नहीं चल सकी थी. यह थी यूरोप की सबसे महंगी डांसर जोसेफिन बेकर. बेकर ने फ्रांस के लिए जासूसी की थी. उसने अपनी खूबसूरती और अदाओं से शत्रु राष्ट्रों के बड़े ऑफिसरों और नेताओं को भरोसे में ले लिया था.
फिल्म अदाकारा और डांसर से जासूस बनी जोसेफिन बेकर की वजह से दूसरे विश्व युद्घ में फ्रांस और मित्र राष्ट्रों को काफी सहायता मिली थी.
म्यूजिक शीट में लिखती थी जासूसी नोट, कपड़े में छिपाकर यात्रा
दूसरे विश्व युद्ध से पहले एक फिल्म अदाकारा और डांसर के रूप में जोसेफिन बेकर अच्छा खासा नाम कमा चुकी थीं. वो उस दौर में पूरे यूरोप की सबसे अधिक कमाई करनी वाली एंटरटेनर थीं.
पेरिस में उनका शो देखने बड़े-बड़े लोग आया करते थे. जिसके चलते जोसेफिन का सत्ता में भी अच्छा दखल हो गया था. खास बात यह भी थी कि जोसेफिन अश्वेत थीं. जबकि उस दौर में यूरोपीय राष्ट्र आमतौर पर अश्वेतों को बड़ी किरदार नहीं मिलती थी.
युद्ध प्रारम्भ होने के कुछ दिन बाद ही जर्मनी ने पेरिस को कब्जे में ले लिया. ऐसे में जोसेफिन ने अपने शो की आड़ में फ्रांस के लिए जासूसी प्रारम्भ कर दी.
जोसेफिन जासूसी के महत्वपूर्ण डॉक्यूमेंट्स म्यूजिक शीट पर लिखा करती थी. जिसके चलते जर्मन सैनिकों को उन पर संदेह नहीं होता. इसके अतिरिक्त उन्होंने खासतौर से बने अपने अंडरगार्मेंट्स में भी महत्वपूर्ण कागजात छिपाने प्रारम्भ कर दिए.
उनके फेम की वजह से उनकी अधिक तलाशी नहीं ली जाती थी. यह वजह है कि जोसेफिन पूरे विश्व में सरलता से फ्रांस की लिए जासूसी करती रहीं.
अमेरिका में अपमान सहना पड़ा, फिर उसी ने दिया अवॉर्ड
जोसेफिन का जन्म 1906 में अमेरिका में हुआ था. जन्म के कुछ दिन बाद ही उनके पिता की मृत्यु हो गई. भयंकर गरीबी में जोसेफिन अपनी पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाईं. केवल 13 वर्ष की उम्र में उनकी विवाह कर दी गई.
इसी दौरान जोसेफिन ने स्टेज परफॉर्मेंस की आरंभ की. लेकिन उन दिनों अमेरिका में अश्वेत लोगों के विरूद्ध कई तरह के नियय लागू थे. उन्हें स्टेज परफॉर्मेंस के दौरान गोरे लोगों के ताने सुनने पड़ते. उनसे अफ्रीका के जंगलों में लौट जाने के लिए बोला जाता.
अपमान और तानों से परेशान होकर जोसेफिन ने अमेरिका छोड़ दिया. वो फ्रांस आ गईं. कला प्रेमी शहर पेरिस ने दिल खोलकर उनका स्वागत किया और जोसेफिन कुछ ही दिनों में यहां बड़ी स्टार बन गई. किसी भी फीचर फिल्म में काम करने वाली वो पहली अश्वेत अदाकारा थीं.
हालांकि बाद में अमेरिका और फ्रांस दोनों राष्ट्रों में जोसेफिन को प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया.
युद्ध प्रारम्भ होते ही फ्रांस को चुकाया नमक का कर्ज
शुरुआत में पेरिस में भी उन्हें संदेह की निगाह से देखा गया. लेकिन जैसे ही दूसरा विश्व युद्ध प्रारम्भ हुआ; जोसेफिन ने फ्रांस के लिए अपनी देशभक्ति दिखाई. फ्रांसीसी सेना के लिए जासूसी करते हुए जोसेफिन शत्रु राष्ट्रों के दूतावास की पार्टी में शामिल होतीं. वहां ऑफिसरों से सरलता से राज की बातें निकलवा लेतीं और उसे म्यूजिक शीट पर लिखकर फ्रांसीसी सेना को दे देतीं.
पेरिस पर नाजियों के कब्जे के बाद उन्होंने कई राष्ट्रों की यात्रा की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाई. ये जानकारियों मित्र राष्ट्रों के काफी काम आई.
रूस-यूक्रेन जंग और उसके पहले भी स्त्री जासूसों की कमी नहीं रही है. अपनी खूबसूरती को ढाल बनाकर घातक मिशन को अंजाम देने वाली ऐसी कई स्त्री जासूस हुई हैं…
50 हजार मौतों की उत्तरदायी जासूस माता हारी
पहले विश्व युद्घ में माता हारी नाम की स्त्री जासूस फ्रांस के लिए जासूसी करती थी. जासूसी की दुनिया में आने से पहले माता हारी डांसर के रूप में करियर बना चुकी थी.
लेकिन पैसों के लालच में माता हारी ने शत्रु राष्ट्र जर्मनी के लिए भी जासूसी प्रारम्भ कर दी. लेकिन बाद में उनका राज खुल गया. 1917 को उनके होटल रूम से अरेस्ट कर लिया गया. इसके बाद उन्हें 50 हजार लोगों की मृत्यु का उत्तरदायी ठहराया गया और 15 सितंबर, 1917 में गोलियों से भूनकर सज़ा-ए-मौत दी गई.
भारतीय मूल की जासूस, जिसे हिटलर ने मारा
नूर इनायत खान दूसरे विश्व युद्ध के दौरान भारतीय मूल की ब्रिटिश जासूस थीं. उन्होंने हिटलर के कब्जे वाले क्षेत्र से अहम जानकारियां निकालकर ब्रिटेन की दीं.
लेकिन 1944 में नाजी सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया. हिटलर के नाजी सैनिकों ने नूर इनायत खान को भयावह सज़ा-ए-मौत दी. जासूस बनने से पहले नूर एक सिंगर थी और बच्चों के लिए किताबें भी लिखती थी.
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हर बार चंगुल से भागी, लेकिन धोखे से पकड़ी गई क्रिस्टीन
क्रिस्टीन ग्रानविले नाम की ब्रिटिश एजेंट ने हिटलर के कब्जे वाले इलाकों में कई घातक जासूस मिशन को अंजाम दिया.
वह कई बार पकड़ी भी गई; लेकिन अपनी सूझबूझ और चालाकी से वह बर बार बच निकलती थी.
लेकिन 1944 में उनके एक साथी जासूस ने ही धोके से उन्हें अरैस्ट करवा दिया. इस बार हिटलर के सैनिक भी पूरी तैयारी में थे. क्रिस्टीन कैद से निकल नहीं पाईं. काफी तड़पाने के बाद उन्हें सज़ा-ए-मौत दी गई.
हिटलर की सेना की यातनाएं झेलकर भी नहीं टूटी जाबो
वायलेट जाबो नाम की स्त्री जासूस को आज भी उसकी हौसला के लिए याद किया जाता है. मित्र देश के लिए जासूसी करने वाली जाबो को 1944 ने नाजी सैनिकों ने पकड़ा था.
लेकिन काफी यातनाओं के बाद भी जाबो ने उन्हें कोई खुफिया जानकारी नहीं है. हिटलर के एक यातना शिविर में उनकी मर्डर कर दी गई.
टॉर्चर झेला, कैद से निकली और पुरस्कार जीती सैनसम
ओडेट सैनसम नाम की स्त्री जासूस उन गिने-चुने लोगों में शामिल थीं; जो हिटलर के यातना शिविर से जिंदा लौट पाए थे. गिरफ्तारी के बाद सैनसम को काफी प्रताड़ित किया गया.
उनको सज़ा-ए-मौत मिलती, इससे पहले ही हिटलर की सेना हार गई और सैनसम आजाद हुईं. बाद में उन्हें प्रतिष्ठित जॉर्ज क्रॉस से सम्मानित किया गया.
ट्रंप को जिताने के लिए अमेरिका पहुंची थी रूसी जासूस
अमेरिका ने वर्ष 2018 में 29 वर्ष की एक रूसी स्त्री को अरैस्ट किया. अमेरिका के अनुसार वह स्त्री एक रूसी एजेंट थी. जिसे 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित करने के लिए अमेरिका भेजा गया था. इस चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की जीत हुई थी. ट्रंप के विरोधी उन पर चुनाव जीतने के लिए रूसी खुफिया एजेंसी की सहायता लेने का आरोप लगाते रहे.