कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाली और दक्षिण गुजरात के जनजातीय बहुल तापी जिले में स्थित व्यारा सीट पर कुल 2.20 लाख मतदाताओं में से लगभग 40,000 यानि 20 फीसदी ईसाई हैं.अधिकांश ईसाई गामित, चौधरी और कोंकणी जनजाति समुदायों से परिवर्तित हुए हैं.
अहमदाबाद. गुजरात की व्यारा विधानसभा सीट पर पहली बार दो ईसाई उम्मीदवारों के बीच मुकाबला देखने को मिलेगा. सत्तारूढ़ बीजेपी (भाजपा) और विपक्षी कांग्रेस पार्टी दोनों ने इस सीट पर ईसाई उम्मीदवार उतारे हैं. इस सीट से गुजरात को अमरसिंह चौधरी के रूप में पहला सीएम मिला था. कांग्रेस पार्टी ने अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित इस सीट से अपने मौजूदा विधायक पूनाभाई गामित को टिकट दिया है, तो वहीं बीजेपी ने चार बार से विधायक गामित से मुकाबले के लिए पहली बार ईसाई उम्मीदवार मोहन कोंकणी को मैदान में उतारा है.
गामित का बोलना है कि ईसाई मतदाता फिर से कांग्रेस पार्टी को वोट देंगे, जबकि कोंकणी का दावा है कि राज्य में बीजेपी गवर्नमेंट द्वारा किए गए विकास के कारण लोग उनकी पार्टी के पक्ष में मतदान करेंगे. सियासी विश्लेषकों का बोलना है कि कमजोर वर्गों को साथ लेकर चलने के कांग्रेस पार्टी के दृष्टिकोण ने जनजातीय बहुल सीटों पर जीत हासिल करने में उसकी सहायता की है, जबकि इस विधानसभा क्षेत्र में सामाजिक पहलुओं को देखते हुए बीजेपी को जीत हासिल करने के लिए मशक्कत करनी पड़ सकती है.
कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाली और दक्षिण गुजरात के जनजातीय बहुल तापी जिले में स्थित व्यारा सीट पर कुल 2.20 लाख मतदाताओं में से लगभग 40,000 यानि 20 फीसदी ईसाई हैं.अधिकांश ईसाई गामित, चौधरी और कोंकणी जनजाति समुदायों से परिवर्तित हुए हैं. एक दिसंबर को पहले चरण में इस सीट पर मतदान होना है. कांग्रेस पार्टी के कद्दावर नेता अमरसिंह चौधरी ने 1972 से 1985 के बीच चार बार इस सीट पर जीत हासिल की थी. वर्ष 1985 में वह राज्य के पहले और अब तक के एकमात्र जनजातीय सीएम बने थे. समाज शास्त्री गौरांग जानी ने बोला कि कमजोर समुदायों को साथ लेकर चलने के अपने दृष्टिकोण के कारण जनजातीय सीटों पर कांग्रेस पार्टी को कामयाबी मिली है, जिससे बीजेपी को अपनी रणनीति पर फिर से विचार करने को विवश होना पड़ा है. उन्होंने दावा किया कि इस क्षेत्र में जनजातीय समुदायों का धर्मांतरण करके ईसाई धर्म अपनाना लंबे समय से जारी है, जिससे इसके सामाजिक समीकरण “जटिल” हो गए हैं.