नई दिल्ली, 5 मार्च (आईएएनएस). निखिल चंद्र मंडल 13 वर्ष तक अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति (एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल कन्फेशन) के अनुसार कारागार में रहा. उस पर अपनी पत्नी की मर्डर का आरोप था.
न्यायेतर स्वीकारोक्ति के अभियोजन ने मंडल को, जो अब लगभग 64 साल का है, 40 वर्ष तक परेशान किया, वह अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए कानून से जूझ रहा था.
इस सप्ताह की आरंभ में उच्चतम न्यायालय ने यह कहते हुए उसकी रिहाई का आदेश दिया : यह कानून का सिद्धांत है कि अतिरिक्त-न्यायिक स्वीकारोक्ति सबूत का कमजोर टुकड़ा है.
जस्टिस बीआर गवई और संजय करोल की खंडपीठ ने बोला : यह माना गया है कि जहां एक अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति संदिग्ध परिस्थितियों से घिरी हुई है, इसकी विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाती है और यह अपना महत्व खो देती है.
मंडल का अगुवाई करने वाली वकील रुखसाना चौधरी ने जोर देकर तर्क दिया कि कलकत्ता हाई कोर्ट ने ट्रायल न्यायालय द्वारा पारित सुविचारित निर्णय और बरी करने के आदेश को उलट कर घोर गलती की है. उन्होंने ेकहा कि तीन गवाहों को किए गए एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल कन्फेशन बयान पर विश्वास न करने वाले ट्रायल न्यायालय के निष्कर्ष को या तो विकृत या गैर कानूनी नहीं बोला जा सकता और हाई कोर्ट के निर्णय को रद्द करने की मांग की गई है.
पश्चिम बंगाल गवर्नमेंट ने मंडल के बचाव का यह कहते हुए विरोध किया कि हाई कोर्ट ने ठीक पाया है कि गवाहों के सामने की गई एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल कन्फेशन भरोसेमंद, विश्वसनीय और ठोस थी.
चौधरी के अनुसार, अपनी पत्नी की मर्डर के बाद गिरफ्तारी और 2008 में हाई कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद से उन्होंने 13 वर्ष से अधिक कारागार में बिताए हैं. पीठ ने बोला कि यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि शक कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह उचित शक से परे सबूत का जगह नहीं ले सकता.
इसने आगे बोला कि यह अच्छी तरह से स्थापित है कि यह सावधानी का एक नियम है, जहां न्यायालय आमतौर पर इस तरह के अतिरिक्त-न्यायिक स्वीकारोक्ति पर कोई भरोसा करने से पहले स्वतंत्र, विश्वसनीय पुष्टि की तलाश करेगी.
पीठ ने कहा, यह माना गया है कि इसमें कोई शक नहीं है कि दोषसिद्धि एक अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति पर आधारित हो सकती है, लेकिन चीजों की प्रकृति में यह सबूत का कमजोर टुकड़ा है.
मंडल ने अपनी दोषसिद्धि और सजा के विरूद्ध 2010 में शीर्ष न्यायालय का रुख किया था. अभियोजन का मामला मंडल द्वारा कथित तौर पर अपने तीन साथी ग्रामीणों के सामने किए गए असाधारण स्वीकारोक्ति पर टिका था, जिन्हें पुलिस ने अभियोजन पक्ष का गवाह बनाया था.
शीर्ष न्यायालय ने बोला कि आईपीसी की धारा 302 के अनुसार दंडनीय क्राइम के लिए अपीलकर्ता को दोषी ठहराने की गवर्नमेंट की अपील पर दिसंबर 2008 में पारित हाई कोर्ट के निर्णय को रद्द कर दिया गया है.
पीठ ने 1984 के एक निर्णय का हवाला देते हुए बोला कि यह देखा जा सकता है कि इस न्यायालय ने यह माना है कि जिन परिस्थितियों से क्राइम का निष्कर्ष निकाला जाना है, वह पूरी तरह से स्थापित होनी चाहिए.
पीठ ने बोला कि यह माना गया है कि परिस्थितियां एक निर्णायक प्रकृति और प्रवृत्ति की होनी चाहिए और उन्हें साबित करने की मांग को छोड़कर हर संभव परिकल्पना को बाहर करना चाहिए.
खंडपीठ ने कहा, साक्ष्य की एक श्रृंखला इतनी पूर्ण होनी चाहिए कि अभियुक्त की बेगुनाही के साथ संगत निष्कर्ष के लिए कोई उचित आधार न छोड़े और यह दर्शाए कि सभी मानवीय आसार में अभियुक्त द्वारा कार्य किया जाना चाहिए.
हत्या कथित तौर पर मार्च 1983 में पश्चिम बंगाल के बर्दवान जिले में की गई थी. ट्रायल न्यायालय ने मार्च 1987 में मुद्दे का निर्णय किया, जिस पर अपनी पत्नी की कथित रूप से मर्डर करने का आरोप लगाया गया था.
–आईएएनएस
केसी/एसजीके