क्या बिल में क्या खास है, क्यों इस बिल की आवश्यकता पड़ी और राजस्थान गवर्नमेंट के इस राइट टू हेल्थ बिल का विरोध क्यों हो रहा है?
अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी गवर्नमेंट द्वारा 21 मार्च को विधानसभा में पारित स्वास्थ्य के अधिकार विधेयक के विरूद्ध राजस्थान में काम करने वाले चिकित्सक एक हफ्ते से अधिक समय से सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. राज्य के स्वास्थ्य कर्मियों का बोलना है कि वे तब तक आंदोलन जारी रखेंगे जब तक गवर्नमेंट विधेयक को वापस नहीं ले लेती. विधेयक के विरोध में राजस्थान में हजारों चिकित्सक सड़कों पर उतरे, जिससे राज्य भर में स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हुईं. राष्ट्र के सबसे बड़े फिजीशियन एसोसिएशन भारतीय मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने राजस्थान के डॉक्टरों को अपना योगदान देने का घोषणा किया है. विधेयक को पिछले हफ्ते राज्य विधानसभा में पारित किया गया था. जबकि डॉक्टरों ने बिल को सख्त बोला है, राज्य गवर्नमेंट ने दावा किया है कि उनकी कई शिकायतों को कानून के नवीनतम संस्करण में पहले ही संबोधित कर दिया गया है. ऐसे में हमने राजस्थान गवर्नमेंट के इस बिल का आज एमआरआई स्कैन कर आपको पूरा मामला समझाने का सोचा. क्या बिल में क्या खास है, क्यों इस बिल की आवश्यकता पड़ी और राजस्थान गवर्नमेंट के इस राइट टू हेल्थ बिल का विरोध क्यों हो रहा है?
अनुच्छेद 21 के दायरे में स्वास्थ्य का अधिकार
साल 1996 में उच्चतम न्यायालय ने अपने एक निर्णय में बोला था कि जीवन जीने का अधिकार अनुच्छेद 21 के दायरे में स्वास्थ्य का अधिकार भी शामिल होता है. उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में इस बात का भी संकेत दिया था कि स्वास्थ्य सेवा मौजूद कराना राज्य गवर्नमेंट का दायित्व है. राज्य गवर्नमेंट की ओर से नागरिकों को उचित स्वास्थ्य सुविधाएं मौजूद कराने के लिए समय-समय पर अनेक तरह की योजनाएं प्रारम्भ की जाती रही हैं. इन्हीं में से एक है राजस्थान गवर्नमेंट का राइट टू हेल्थ बिल.
क्या है राइट टु हेल्थ एक्ट ?
इस एक्ट के अनुसार राजस्थान के हर निवासी को राज्य के किसी भी हेल्थ इंस्टीट्यूट में पूर्व भुगतान के बिना इमरजेंसी उपचार के साथ फ्री उपचार का फायदा उठाने का अधिकार है. यह विधेयक किसी भी क्लिनिक में फ्री उपचार की सुविधा लेने का अधिकार देता है. कोई भी आदमी पब्लिक हेल्थ संस्थानों में फ्री आउटडोर और इनडोर पेशंट डिपार्टमेंट सर्विस, कन्सल्टेशन, दवा और डायग्नोस्टिक का फायदा ले सकता है.
डॉक्टर विरोध क्यों कर रहे हैं?
प्रदर्शनकारियों का दावा है कि बिल रोगियों की अधिक सहायता नहीं करता है, लेकिन डॉक्टरों और अस्पतालों को दंडित करता है. बिल का सबसे विवादास्पद खंड सभी अस्पतालों सार्वजनिक और निजी दोनों को जरूरत पड़ने पर बिना किसी पूर्व भुगतान के इमरजेंसी इलाज की पेशकश को जरूरी करता है. राजस्थान में विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए आईएमए के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ शरद कुमार अग्रवाल ने बोला कि स्वास्थ्य प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, लेकिन इसे प्रदान करना राज्य गवर्नमेंट की जिम्मेदारी है. क्योंकि वे ऐसा करने में असमर्थ हैं, इसलिए वे इसे डॉक्टरों पर डाल रहे हैं. हम गवर्नमेंट का समर्थन करने के लिए तैयार हैं लेकिन हम पूरी जिम्मेदारी नहीं उठा सकते. गवर्नमेंट उनके अस्पतालों में प्रत्येक बिस्तर को चलाने के लिए लगभग 20,000 रुपये से 40,000 रुपये खर्च करती है. हमें यह धन कौन प्रदान करेगा? अधिनियम यह नहीं कहता कि इन खर्चों का भुगतान कौन करेगा. हम गवर्नमेंट से इस सख्त विधेयक को वापस लेने का आग्रह करते हैं. अधिनियम में उल्लेख है कि गवर्नमेंट अस्पतालों की प्रतिपूर्ति करेगी, लेकिन प्रदर्शनकारियों का बोलना है कि यह रकम कैसे और कब आएगी, इस पर कोई स्पष्टता नहीं है.
क्या यह संविधान के अनुच्छेद19 (1) (g) का उल्लंघन है ?
एक्सपर्ट्स का बोलना है कि बिल में यह साफ नहीं है कि क्या राज्य प्राइवेट क्लिनिक को उपचार का भुगतान करेगा. यह संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (g) का उल्लंघन कर सकता है, जो किसी भी पेशे की प्रैक्टिस करने या कोई भी व्यवसाय या व्यापार करने के अधिकार की गारंटी देता है. फ्री सर्विस देने के प्राइवेट क्षेत्र पर दायित्व का अर्थ है कि कोई भी निवासी भुगतान नहीं करेगा. यदि गवर्नमेंट लागत की प्रतिपूर्ति नहीं करती है, तो प्राइवेट संस्थानों के पास रेवेन्यू नहीं आएगा और संभवतः बंद हो जाएंगे.
डॉक्टरों को किस बात का डर ?
राजस्थान के डॉक्टरों को डर है कि कानून मेडिकल प्रफेशनल्स, विशेष रूप से प्राइवेट डॉक्टरों को हानि पहुंचा सकता है. आलोचकों का दावा है कि यह मेडिकल प्रफेशनल्स की राय की उपेक्षा करता है, तैयार नहीं है, और प्रणाली की व्यावहारिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखने में विफल रहता है. डॉक्टरों का यह भी मानना है कि एक वार कानून लागू होने के बाद उनके कामकाज में ब्यूरोक्रेट्स का हस्तक्षेप बढ़ जाएगा. उनका मानना है कि इस कानून से लोगों को लाभ नहीं होगा और यह प्राइवेट अस्पतालों के लिए बोझ हो जाएगा.
क्या कहते हैं जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ?
डॉक्टरों ने अपना विरोध जारी रखा है, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने के लिए काम कर रहे कई लोगों ने बोला है कि विधेयक ठीक दिशा में एक कदम है. जन स्वास्थ्य अभियान के राष्ट्रीय सह-संयोजक और विधेयक का मसौदा तैयार करने के शुरुआती चरणों में शामिल लोगों में से एक अभय शुक्ला ने बोला कि इमरजेंसी इलाज के कारण विधेयक को वापस लेने की मांग गलत है. यदि आप विधेयक पढ़ते हैं, तो इसका 95% सरकारी स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों को जवाबदेह बनाने की बात करता है. शुक्ला ने बोला कि जैसे मनरेगा ने काम को अधिकार बना दिया, जब स्वास्थ्य अधिकार बन जाएगा तो लोग गवर्नमेंट से इसकी मांग करने के लिए सशक्त होंगे. यह सिस्टम में खामियों पर गवर्नमेंट का ध्यान आकर्षित करेगा. उन्होंने आगे बोला कि सभी अस्पतालों पर बिल के सिर्फ 5% के लिए इमरजेंसी देखभाल खाते प्रदान करने के लिए बोला जा रहा है. निजी अस्पतालों की भी लोगों के प्रति कुछ जिम्मेदारी है- डॉक्टरों की शिक्षा पर करदाताओं ने सब्सिडी दी है, कभी अस्पतालों के लिए जमीन पर गवर्नमेंट सब्सिडी देती है, उनके लिए कई अन्य सब्सिडी हैं. गवर्नमेंट यह नहीं कह रही है कि उन्हें किसी का निःशुल्क में उपचार करना है. उन्होंने बोला कि यह बोलना गलत है कि बिल सुझाव देता है कि एक नेत्र हॉस्पिटल को दिल के दौरे या हादसा के मुद्दे का उपचार करने के लिए विवश किया जाएगा, क्योंकि अस्पतालों को बिल के मुताबिक सिर्फ “उचित स्तर की देखभाल” प्रदान करनी होगी. उन्होंने इसमें जोड़ते हुए बोला कि परिवार का कोई भी सदस्य दिल के दौरे से पीड़ित आदमी को आंखों का उपचार करने वाला हॉस्पिटल तो लेकर नहीं जाएगा.
डॉक्टरों का अगला कदम क्या होगा?
डॉक्टरों के प्रतिनिधिमंडल ने मुद्दे का हल निकालने के लिए स्वास्थ्य विभाग के ऑफिसरों से मुलाकात की. बैठक वेनतीजा रही क्योंकि डॉक्टरों का एक ही एजेंडा है इस कानून को वापस लेना. डॉक्टरों ने विधेयक को वापस नहीं लिए जाने पर आने वाले दिनों में अपना विरोध तेज करने की धमकी दी है. राज्य के स्वास्थ्य मंत्री परसादी लाल मीणा ने बोला है कि गवर्नमेंट किसी भी मूल्य पर बिल को वापस नहीं लेगी. उनका बोलना है कि बहुत चर्चा के बाद बिल हमारी गवर्नमेंट ने पारित किया.
कुछ विकल्प क्या हैं?
दिल्ली में एक योजना है जिसके अनुसार सभी अस्पतालों को दिल्ली के क्षेत्र के भीतर सड़क यातायात दुर्घटनाओं, आग और एसिड हमलों के इमरजेंसी इलाज के लिए प्रतिपूर्ति की जाती है. दिल्ली गवर्नमेंट के स्वास्थ्य विभाग के साथ काम कर चुके शालीन मित्रा का बोलना है कि वैसे पहले से ही उच्चतम न्यायालय का एक निर्णय है कि अस्पतालों को इमरजेंसी देखभाल प्रदान करनी है, हमने इसे लागू करने के लिए यह सुनिश्चित किया कि अस्पतालों को प्रतिपूर्ति मिले. उन्होंने बोला कि सभी हितधारकों को बोर्ड पर लाया गया और उनके मुद्दों को हल किया गया.