यूपी में राजपूतों के गुस्से के कारण बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को पहले चरण में 101 लोकसभा सीटों पर हुए मतदान में आश्चर्यजनक उलटफेर का सामना करना पड़ा. ताजा मतगणना रुझानों के अनुसार, विपक्षी दल इण्डिया ब्लॉक इनमें से 64 सीटों पर आगे चल रहा है, जबकि बीजेपी 33 सीटों पर आगे है. इण्डिया ब्लॉक की बढ़त को पश्चिमी यूपी के सियासी रूप से जरूरी क्षेत्र ने मजबूती दी है.
अखिलेश यादव की सपा और कांग्रेस पार्टी ने सहारनपुर, कैराना, मुरादाबाद, मुजफ्फरनगर और रामपुर जैसे प्रमुख निर्वाचन क्षेत्रों में एनडीए को धूल चटा दी. पीलीभीत के उम्मीदवार जितिन प्रसाद के मजबूत प्रदर्शन और सहयोगी आरएलडी की बिजनौर में बढ़त के कारण सत्तारूढ़ पार्टी को हार का सामना नहीं करना पड़ा.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इण्डिया ब्लॉक की मजबूत बढ़त और बीजेपी के सफाए का श्रेय प्रमुख राजपूत समुदाय के बीच बढ़ते आक्रोश को दिया जा सकता है, जो गवर्नमेंट द्वारा कम अगुवाई और अनदेखी महसूस करते हैं. पश्चिमी यूपी में लगभग 10 फीसदी जनसंख्या वाले राजपूत अपने नेताओं को लोकसभा टिकट न मिलने से परेशान हैं. पहले चरण में मतदान करने वाले आठ निर्वाचन क्षेत्रों में, बीजेपी ने सिर्फ़ एक राजपूत उम्मीदवार कुंवर सर्वेश सिंह को मैदान में उतारा था, जिनकी मतदान के एक दिन बाद मौत हो गई थी. शेष आठ निर्वाचन क्षेत्रों में, बीजेपी की ओर से कोई भी राजपूत उम्मीदवार नहीं था.
राजपूत अपने असंतोष के बारे में मुखर रहे हैं, उन्होंने अप्रैल में सहारनपुर में एक विशाल महापंचायत आयोजित की. वे विशेष रूप से बीजेपी के मौजूदा सांसद और मुजफ्फरनगर के उम्मीदवार, केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान, जो जाट हैं, के खिलाफ़ उग्र थे, जिन्होंने राजपूतों को श्रमिकों के बराबर बताकर लोगों को परेशान किया.
यह समुदाय उम्मीदवारों के चयन से भी नाखुश था, जैसे कि गाजियाबाद में मौजूदा सांसद और सेवानिवृत्त सेना जनरल वीके सिंह, जो राजपूत थे, की स्थान बनिया समुदाय के उम्मीदवार को लाना.
पश्चिमी यूपी में इण्डिया ब्लॉक की मजबूत बढ़त और बीजेपी के सफाए का श्रेय प्रमुख राजपूत समुदाय के बीच बढ़ते असंतोष को दिया जा सकता है, जो गवर्नमेंट द्वारा कम अगुवाई और अनदेखी महसूस करते हैं. पश्चिमी यूपी की जनसंख्या में लगभग 10 फीसदी राजपूत अपने नेताओं के लिए लोकसभा टिकट की कमी से परेशान हैं.
पहले चरण में मतदान करने वाले आठ निर्वाचन क्षेत्रों में, बीजेपी ने सिर्फ़ एक राजपूत उम्मीदवार कुंवर सर्वेश सिंह को मैदान में उतारा, जिनकी मतदान के एक दिन बाद मौत हो गई. शेष आठ निर्वाचन क्षेत्रों में, बीजेपी की ओर से कोई राजपूत उम्मीदवार नहीं था.
राजपूत अपने असंतोष के बारे में मुखर रहे हैं, उन्होंने अप्रैल में सहारनपुर में एक विशाल महापंचायत आयोजित की. वे विशेष रूप से बीजेपी के मौजूदा सांसद और मुजफ्फरनगर के उम्मीदवार, केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान, जो जाट हैं, के खिलाफ़ उग्र थे, जिन्होंने राजपूतों की तुलना श्रमिकों से करके लोगों को परेशान कर दिया था. यह समुदाय उम्मीदवारों के चयन से भी नाखुश था, जैसे कि गाजियाबाद में मौजूदा सांसद और सेवानिवृत्त सेना जनरल वीके सिंह, जो राजपूत हैं, की स्थान बनिया समुदाय के उम्मीदवार को लाना.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ द्वारा चुनावी रैलियों और रोड शो के दौरान राजपूतों तक पहुँचने के प्रयासों के बावजूद, असंतोष कायम है. विपक्षी सपा और बसपा ने रैलियों में साफ आह्वान करके और प्रमुख सीटों के लिए रणनीतिक रूप से उम्मीदवारों को चुनकर इस भावना को भुनाने की प्रयास की.
लोकसभा चुनावों के नतीजे यूपी में बीजेपी के प्रभुत्व के भविष्य को निर्धारित करने में जरूरी होंगे, जहाँ बीजेपी ने 42 सीटों पर बढ़त बनाकर बड़ा उलटफेर किया है.
उत्तर प्रदेश में एनडीए का निराशाजनक प्रदर्शन, जो 543 सदस्यीय लोकसभा में 80 सदस्य भेजता है, 2014 और 2019 के चुनावों में इसकी पिछली सफलताओं के एकदम उल्टा है. बीजेपी और उसकी सहयोगी अपना दल ने 2019 के लोकसभा चुनाव में 80 में से 64 सीटें जीतीं, जबकि सपा को केवल पांच सीटें मिलीं और कांग्रेस पार्टी एक सीट पर सफल रही