सुप्रीम न्यायालय ने शुक्रवार को ज्ञानवापी का मामला सिविल जज (सीनियर डिवीजन) से वाराणसी के जिला जज को ट्रांसफर कर दिया. अपने अंतरिम आदेश में उच्चतम न्यायालय ने बोला कि वाराणसी के जिला जज सबसे पहले इस मामले पर निर्णय सुनाएंगे कि मस्जिद में श्रृंगार गौरी की पूजा करने के लिए पांच हिन्दू स्त्रियों ने जो याचिका दी थी, क्या वह ग्रहणयोग्य है या नहीं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ज्ञानवापी परिसर में शिवलिंग क्षेत्र की सुरक्षा के लिए 17 मई का उसका अंतरिम आदेश जारी रहेगा.
जस्टिस डी। वाई। चंद्रचूड़, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस पी।एस नरसिम्हा की पीठ ने कहा-‘इस मुद्दे की सुनवाई कुछ अधिक अनुभवी और परिपक्व हाथों से होनी चाहिए’. हालांकि उच्चतम न्यायालय ने कहा, ‘हम ट्रायल जज को कोई गुनाह नहीं दे रहे हैं, लेकिन यदि एक अधिक अनुभवी और परिपक्व हाथ इस मुकदमा को संभालता है तो इससे सभी पक्षों को लाभ होगा.’
सुप्रीम न्यायालय की खंडपीठ ने कहा, यह उसके लिए ‘देश में एकता की भावना को बनाए रखने का एक साझा मिशन है. एक बार आयोग की रिपोर्ट आ जाने के बाद उससे कुछ गिनी-चुनी चीजें लीक नहीं हो सकती. प्रेस को ये चीजें लीक न करें. सिर्फ जज ही रिपोर्ट को खोल कर पढें.’ पीठ ने यह भी कहा, ‘हम एक जिला जज को गाइड नहीं कर सकते. यह मामला उन्हें संभालने दें. उनके पास पर्याप्त अनुभव है. हम उन्हें यह आदेश नहीं दे सकते कि वे इस मुकदमा को इस तरह या उस तरह सुनें. ‘ उच्चतम न्यायालय ने यह टिप्पणी तब की जब अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद समिति के वकील हुजैफा अहमदी ने न्यायालय को बताया कि प्रारम्भ से (सिविल न्यायालय द्वारा) पारित सभी आदेशों से समाज को एक बड़ा हानि हो सकता है. यह संसद द्वारा पारित कानून के बावजूद हो रहा है.’
हिंदू पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन ने कहा, ‘आज की विशेष अनुमति याचिका निष्प्रभावी है क्योंकि तीनों आदेशों का पहले ही पालन किया जा चुका है. अब ज्ञानवापी मस्जिद का धार्मिक चरित्र तय करना होगा. आयोग की रिपोर्ट न्यायालय को देखना होगा.’ बेंच ने उनके इस तर्क का उत्तर देते हुए कहाः ‘हमने आपकी बात मान ली, इसलिए हम इसे जिला जज को सौंप रहे हैं.‘
वहीं निचली न्यायालय द्वारा नियुक्त कमिश्नरों द्वारा गुरुवार को सर्वे रिपोर्ट पेश की गई जो इंगित करती है कि जहां ज्ञानवापी मस्जिद है वहां एक शिव मंदिर हो सकता है. हिंदू पक्ष का दावा है कि उस स्थान पर 450 वर्ष पुराना बाबा विश्वनाथ मंदिर उपस्थित था.
हिंदू पक्ष का दावा है कि मंदिर के कुछ हिस्से ज्ञानवापी मस्जिद के भीतर छिपे हुए हैं. इस परिसर में भगवान शिव और अन्य देवी-देवताओं को दर्शाने वाले कई धार्मिक चिन्ह पाए गए हैं. सर्वे टीम को ज्ञानवापी परिसर जो आकृतियां मिलीं उनमें त्रिशूल, डमरू, कमल के फूल, के साथ ही दीवारों पर शंख और स्वास्तिक, घंटियां और पान के पत्ते के निशान हैं. अनुष्ठान के लिए मंडप प्राचीन मंदिर के अस्तित्व की तरफ इशारा करते हैं.
तीन सीलबंद बक्सों में 15 पेज की रिपोर्ट के साथ 32 जीबी की वीडियो फुटेज, नक्शों का पुलिंदा और फोटोज़ सिविल जज (सीनियर डिवीजन) रवि कुमार दिवाकर को सौंपी गई हैं. सोमवार (23 मई) को जब न्यायालय इस मुद्दे की सुनवाई करेगी तब आधिकारिक तौर पर इस रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाएगा.
दोनों पक्ष भले ही अपने-अपने दावे कर रहे हों, लेकिन अब तक जो हिंदू धर्म से जुड़े प्रतीकों के प्रमाण मिले हैं, उनसे साफ पता चलता है कि जहां मस्जिद है, वहां 450 वर्ष पुराना बाबा विश्वनाथ मंदिर था.
जिस समय सर्वे चल रहा था उस समय ज्ञानवापी परिसर के अंदर कुल 52 लोग थे, जिनमें दोनों पक्षों के वकील भी शामिल थे. इस सर्वे रिपोर्ट को एकतरफा नहीं बोला जा सकता. उत्तरी हिंदुस्तान के अधिकतर मंदिरों में शंख के आकार के शिखर हैं. इस समय जो काशी विश्वनाथ मंदिर बना है उसका शिखर भी शंकुआकार के ही है. सबसे अहम बात यह है कि शंख के आकार की संरचना न सिर्फ उत्तरी गुंबद के अंदर बल्कि तीनों गुंबदों में है. इतना ही नहीं इस शिखरनुमा आकृति में फूल, पान के पत्ते और कमल के फूल की आकृतियां भी मिली हैं.
अब प्रश्न यह है कि दुनिया की किस मस्जिद में स्वास्तिक के निशान हैं ? किस मस्जिद में कमल के फूल, त्रिशूल और घंटियां खुदी हैं. किस मुसलमान घर की दीवारों पर राम का नाम खुदा है ? अंजुमन इंतजामिया मसाजिद के वकील कह रहे हैं कि चूंकि कारीगर हिन्दुस्तान के थे इसलिए औरंगजेब के उस जमाने में मस्जिद की दीवारों पर त्रिशूल, कमल, स्वास्तिक और घंटियां बना दी. मुझे तो आश्चर्य इस बात की है कि उन्होंने ये नहीं बोला कि गुंबदों से बारिश का पानी नीचे न टपके इसलिए गुंबदों के नीचे मंदिर के शिखर बना दिए.
जब सर्वे रिपोर्ट का विवरण मीडिया के माध्यम से सामने आया तो एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी एक अलग तर्क के साथ सामने आए. उन्होंने सर्वे रिपोर्ट तैयार करने वाली न्यायालय द्वारा नियुक्त कमिश्नरों पर प्रश्न उठा दिया. ओवैसी ने कि बोला रिपोर्ट बनाने वाले ही निष्पक्ष नहीं थे. मुसलमान पक्ष ने जिन्हें न्यायालय कमिश्नर नियुक्त करने पर विरोध जताई थी और जिनकी निष्पक्षता पर प्रश्न उठाए थे, लोअर न्यायालय ने उन्हीं को मुंसिफ बना दिया तो ऐसी ही रिपोर्ट आएगी. आप और क्या आशा कर सकते हैं?
ओवैसी की ये बात ठीक है कि निर्णय उच्चतम न्यायालय ही करेगा. दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद सबूतों के आधार पर करेगा ही निर्णय होगा. लेकिन ये बात गलत है कि यदि रिपोर्ट आपके मनमाफिक नहीं है तो सर्वे करने वालों की ईमानदारी, निष्पक्षता और निष्ठा पर ही प्रश्न उठा दिए जाएं. ये निचली न्यायालय की तौहीन है. ओवैसी ने तो एक लाइन में कह दिया कि न्यायालय कमिश्नर निष्पक्ष नहीं थे लेकिन उन्होंने ये नहीं बताया कि मुसलमान पक्ष इसी तरह न्यायालय में हर बार न्यायालय कमिश्रर का विरोध करके मुद्दे को लटकाता रहा है. मुसलमान पक्ष की मांग पर पहले भी दो बार न्यायालय कमिश्नर बदले जा चुके थे. इसके बाद भी यदि कोई निचली न्यायालय की निष्पक्षता पर प्रश्न उठाए तो मुझे लगता है कि उसकी नीयत में खोट है.
दूसरी बात, ओवैसी ये कह रहे हैं कि उच्चतम न्यायालय इस मुकदमा को खारिज कर दे. इसे बैलेंस करने की आवश्यकता नहीं है. वो कह रहे हैं कि सबको किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले उच्चतम न्यायालय के निर्णय का इन्तजार करना चाहिए. लेकिन ओवैसी उन मुसलमान नेताओं और मौलानाओं को नहीं समझाते जो स्वयं उच्चतम न्यायालय के निर्णय का इन्तजार करने को तैयार नहीं है. जो अभी से धमकी दे रहे हैं. रज़ा अकेडमी के सचिव मौलाना खलील उर रहमान ने धमकी भरे अंदाज में कहा, ‘मुसलमानों के सब्र का बांध टूट रहा है, उनसे एक-एक कर मस्जिदें छीनी जा रही हैं. भाजपा एक बार में ही बता दे कि उसे कौन-कौन सी मस्जिदें चाहिए जिससे मुसलमानों को सड़कों पर उतर आने में सरलता हो.’ सपा के सांसद शफीकुर रहमान बर्क ने कहा, ‘ज्ञानवापी मस्जिद को बचाने के लिए मुस्लिम अपनी जान की कुर्बानी देंगे.’ एक अन्य मौलवी मुफ्ती सलमान अज़हरी ने कहा, बर्क साहब को अपना बलिदान देने के लिए पहले आना चाहिए, क्योंकि मुसलमानों ने उन्हें वोट दिया था. उन्होंने यह भी कहा, “हमने बाबरी मस्जिद खो दी है, हम किसी भी कीमत पर ज्ञानवापी मस्जिद को छीनने नहीं देंगे.”
हैरानी की बात ये है कि सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी कह रहे हैं कि हमारे यहां तो कोई कहीं भी पत्थर रख दे, टीका लगा दे, झंडा लगा दे वहीं मंदिर हो जाता है. यदि अखिलेश यादव की यह बात मान भी ली जाए कि कहीं भी पत्थर और लाल झंडा लगा दो तो वो मंदिर हो जाता है तो उन्हें ये बताना पड़ेगा कि जहां शिवलिंग, त्रिशूल, डमरू और स्वास्तिक के निशान मिले वो शिवजी का मंदिर होगा या नहीं. यदि शफीकुर रहमान बर्क ये कहते हैं कि हम इबादतगाह की हिफाजत करेंगे तो वो हिंदुओं को ये कहने से कैसे रोक सकते हैं कि वो अपने मंदिरों की सुरक्षा करेंगे.
अगर मौलाना रहमान कहते हैं कि मुसलमानों से एक-एक करके मस्जिद छीनी जा रही है तो उन्हें ये बताना होगा किसने मस्जिद छीनी. कौन सी मस्जिद छीनी. फिर हिंदू समाज के लोग उनसे पूछेंगे कि जब कश्मीर में मंदिर तोड़े गए तो ये लोग कहां थे ? ये तो ऐतिहासिक तथ्य है कि औरंगजेब ने मंदिरों को तोड़ा और उनकी स्थान पर मस्जिदें बनाई. इसीलिए ये टकराव बार-बार खड़े होते हैं. मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि को लेकर भी इसी तरह का टकराव है.
अब जबकि मामला वाराणसी की जिला न्यायालय में है, सबकी निगाहें इस बात पर रहेंगी कि ज्ञानवापी मुद्दे में जिला जज आगे क्या कदम उठाते हैं.