मशहूर कथावाचक और मोटिवेशनल स्पीकर जया किशोरी ने बहुत कम समय में काफी शोहरत हासिल की है। एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने कई प्रश्नों के बेबाकी से उत्तर दिए। जया किशोरी ने यह भी बताया कि उनकी पहचान बतौर आध्यात्मिक गुरु से है या फिर साध्वी या सोशल मीडिया इंफ्यूएंसर से।
सवालों के उत्तर में जया किशोरी ने कहा, बतौर कथावाचक ही सबसे पहले मेरी पहचान होनी चाहिए। मोटिवेशन सेशन प्रारम्भ करने के पीछे कारण युवाओं को धर्म से जोड़ना था। करीब 7 दिन तक कथा चलती है और प्रत्येक दिन 3-4 घंटे होती है। इतना समय देना आज के दौर में युवाओं के लिए संभव नहीं है।
वैरागी को लेकर भी जया किशोरी ने अपना रुख साफ किया। उन्होंने बोला कि पूर्ण वैरागी बनने के कुछ नियम होते हैं। उनको किसी से कोई मतलब नहीं होता। कुटिया बनाकर रहना होता है। यदि आप ये नहीं कर पा रहे हैं तो आप गृहस्थ जीवन में हैं। मैं बीच का रास्ता नहीं अपनाती। मुझे शहर में रहना है किसी गुफा या कुटिया में नहीं। मैं ऐसी बातों को छिपाती नहीं हूं।
क्या आध्यात्म के लिए ट्रेनिंग ली?
जया किशोरी ने बोला कि वह 6 वर्ष की उम्र से ही कथावाचन कर रही हैं। आध्यात्म के लिए क्या कोई ट्रेनिंग ली है, इस प्रश्न पर उन्होंने बोला कि आज युवा वर्ग डिप्रेशन का शिकार हो रहा है। लोग तुलना कर रहे हैं। हर किसी की जीवन अलग होती है, उनका यात्रा अलग होता है। मैं संत नहीं हूं। उसके लिए मस्तिष्क का संतुलन होना महत्वपूर्ण है। जब सुख-दुख कोई अर्थ न रखे, तब आदमी साधु-संत होता है।
जया किशोरी ने आगे कहा, भगवान के करीब जाने के लिए कोई नियम नहीं होते। काम तो आप लोगों के बीच कमल की तरह रहकर भी कर सकते हैं। मेरे सेशन साधारण होते हैं। उनका मकसद होता है, लोगों तक नॉलेज पहुंचाना। जब मैंने आरंभ की थी तो कथा समझने में दिक्कतें आई थीं। तब सोचती थी कि कथा इस तरह करूंगी कि बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों सबको समझ आए।
बचपन से सुनीं श्रीराम-श्रीकृष्ण की कहानियां
उन्होंने बोला कि मेरे घर में हमेशा से भक्ति का माहौल रहा। श्रीराम और श्रीकृष्ण की कहानियां सुनकर बड़ी हुई हूं। मैं विनोद जी सहल से गुरु दक्षिणा ली है। उन्होंने मुझे श्रीमद्भागवत कथा सिखाई है। बचपन में संगीत भी सीखा। अभी भी छात्रा हूं और सीख रही हूं।