दुनिया भर में हिंदुस्तान की विदेश नीति का डंका बज रहा है। ये डंका यूं ही नहीं बजा। इसके पीछे पीएम मोदी गवर्नमेंट के फैसलों की लंबी फेहरिस्त है जिनकी वजह से हिंदुस्तान की बात का वजन अब भारी हो गया है। सबसे पहले जरा गौर कीजिए World Economic Forum में हिंदुस्तान के विदेश मंत्री एस जयशंकर के उस बयान पर, जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से बोला था कि हिंदुस्तान अपनी विदेश नीति पर किसी का दखल बर्दाश्त नहीं करेगा और हिंदुस्तान वही करेगा जो उसके नागरिकों के लिए ठीक होगा। उस समय ये खुद्दारी अमेरिका समेत कई राष्ट्रों की आंखों में खटक रही थी लेकिन हिंदुस्तान ने अपना अलग रास्ता चुनने का अधिकार कायम रखा है।
सस्ता ऑयल खरीदने की आज़ादी
यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका ने हर उपाय आजमाया। विदेश स्तर की 2+2 मीटिंग के जरिए हिंदुस्तान को दबाव में लाने के लिए विवश किया। लेकिन हिंदुस्तान ने साफ कर दिया कि उसके भलाई सबसे पहले है। लिहाजा हिंदुस्तान ने रूस से ऑयल खरीदना जारी रखा। यूक्रेन युद्ध से पहले हिंदुस्तान अपनी आवश्यकता का केवल 0.2 फीसदी ऑयल खरीदता लेकिन अब ये हिस्सेदारी 10 फीसदी तक पहुंच गई है। हिंदुस्तान ने अमेरिका के दो दुश्मनों ईरान और रूस के साथ अपने संबंधों को अमेरिका की तराजू पर तोलने से साफ इनकार कर दिया। इसे डंका नहीं तो क्या कहेंगे?
अब जब कोई दबाव काम नहीं आया तो अमेरिका जी-7 के जरिए भारत-रूस के ऑयल संबंधों को समाप्त करने की प्रयास कर रहा है। जी-7 के राष्ट्र रूसी ऑयल पर प्राइस कैप लगाने की प्रयास कर रहे हैं ताकि रूस अपना ऑयल सस्ता न कर सके। इससे सबसे अधिक हानि चीन और हिंदुस्तान को होगा…लेकिन जी-7 राष्ट्रों के लिए हिंदुस्तान को इस तरह नजरअंदाज करना इतना आसान नहीं होगा। क्योंकि कोविड का संकट झेल रही चीन की इकोनॉमी के बाद केवल हिंदुस्तान ही एक ऐसी इकोनॉमी है जो दुनिया में सबसे बेहतरीन प्रदर्शन कर रही है। ऐसे में हिंदुस्तान के बाज़ार को अपने सामानों के लिए बाहर करना समझदारी वाला निर्णय नहीं होगा।
SCO में हिंदुस्तान का जलवा
उज्बेकिस्तान के समरकंद में चल रहे SCO समिट में हिंदुस्तान का जलवा कायम है। अगले वर्ष SCO का सम्मलेन हिंदुस्तान में होने जा रहा है। हिंदुस्तान SCO का एकमात्र सदस्य है जो आर्थिक महाशक्ति की तरह उभरकर सामने आया है। चीन कोविड के बाद आई मंदी तो रूस यूक्रेन युद्ध में फंसा है। पूर्व सोवियत सदस्य राष्ट्र आर्थिक तौर पर पिछड़े हैं। SCO का दायरा भी अब बढ़ चुका है। आठ पूर्णकालिक सदस्य हैं तो 6 डॉयलॉग कंट्रीज़ हैं। कुल मिलाकर 14 राष्ट्रों के इस संगठन में एक भी अमेरिका का मित्र राष्ट्र शामिल हैं। ऐसे में अमेरिका की नाराजगी के बावजूद हिंदुस्तान अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के सिद्धांत का पालन करता नज़र आ रहा है।
समरकंद में ही हिंदुस्तान को एससीओ समिट का अगला अध्यक्ष बना दिया गया है। इस दौरान चीन का दबदबा एससीओ से कम होता दिखाई दे रहा है। हिंदुस्तान 2023 के समिट में कुछ ऐसे राष्ट्रों को बुला सकता है जिससे चीन की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
यूक्रेन युद्ध में हिंदुस्तान की तटस्थता
अमेरिका और यूरोपीय राष्ट्रों की अपील का बावजूद हिंदुस्तान ने सुरक्षा परिषद में रूस के विरूद्ध मतदान नहीं किया। हिंदुस्तान ने अपना रूख साफ कर दिया है कि वो अमेरिका और यूरोपीय राष्ट्रों का पिछलग्गू नहीं है। स्वयं यूक्रेन की सहायता करने के लिए ना तो नाटो आया और ना अमेरिका। हिंदुस्तान की तटस्थ रहने की नीति काम कर गई। आज यूक्रेन को भी समझ में आ रहा होगा कि यूरोपीय राष्ट्रों और अमेरिका ने यूक्रेन को केवल युद्ध की आग में झोंकने का काम किया है। हिंदुस्तान ने इस संकट का लाभ उठाते हुए रूस से और अधिक ऑयल खरीदा ताकि राष्ट्र में महंगाई को कम किया जा सके। हिंदुस्तान युद्ध के पक्ष में नहीं था। हिंदुस्तान ने यूक्रेन से भी वार्ता करने का आग्रह किया था।
जी20 की मेजबानी
भारत की इमेज पिछले कुछ वर्षों में बिल्कुल बदल गई है। जब हर स्थान मंदी (Slowdown) का साया है, हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था कुलांचे मार रही है। हाल में ब्रिटेन को पछाड़ हिंदुस्तान दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसका रुतबा लगातार बढ़ रहा है। अब वह दुनिया के 20 सबसे ताकतवर राष्ट्रों के समूह जी20 की मेजबानी करने वाला है। अगले वर्ष 9 और 10 सितंबर को यह बैठक होगी हालांकि, हिंदुस्तान ने इसे भी अपने अंदाज में आयोजित करने का मन बनाया है। जी20 के सदस्य राष्ट्रों के अतिरिक्त वह इसमें मित्र राष्ट्रों को भी इनवाइट करेगा। इनमें बांग्लादेश, मिस्र, मॉरीशस, नाइजीरिया, नीदरलैंड्स, ओमान, स्पेन, सिंगापुर और संयुक्त अरब अमीरात गेस्ट होंगे। कुल अंतरराष्ट्रीय कारोबार में जी20 राष्ट्रों की हिस्सेदारी 75 प्रतिशत है। ग्लोबल जीडीपी में इस समूह का हिस्सा 85 प्रतिशत है।
यूक्रेन से युद्ध के बाद रूस पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद हिंदुस्तान लगातार रूसी बाजार से ऑयल खरीद रहा है। ऐसे में वर्ष 2019 से बंद ऑयल सप्लाई को अब ईरान एक बार फिर प्रारम्भ करना चाहता है। SCO में हिंदुस्तान और ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी से मुलाकात करेंगे जिन्होंने पिछले महीने ही कार्यभार संभाला है। ईरान चाहता है कि हिंदुस्तान अमेरिकी दबाव को हटाकर उससे अधिक से अधिक ऑयल खरीदे। इमरजिंग बाजार में हिंदुस्तान के जलवे के बाद अब दुनिया हैरत में है कि सपेरों का राष्ट्र अब अपनी बात इतने दमदार ढंग से कैसे रख पा रहा है।