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11 और 12 अगस्त को सावन महीने की आखिरी तिथि पूर्णिमा है. इस तिथि पर शिव जी का प्रिय महीना समाप्त हो जाएगा. शिव पूजा में जल के साथ ही बिल्व पत्र जरूरी रूप से चढ़ाया जाता है. शिवलिंग पर चढ़े हुए बिल्व पत्र खाने की परंपरा पुराने समय से चली आ रही है. बिल्व के सेवन से धर्म फायदा के साथ ही स्वास्थ्य फायदा भी मिलते हैं.
बिल्व पत्र के बिना अधूरी मानी जाती है शिव पूजा
- उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं। मनीष शर्मा के मुताबिक बिल्व पत्र शिव पूजा में जरूरी रूप से चढ़ाई जाती है.
- ऐसी मान्यता है कि यदि कोई आदमी जल के साथ बिल्व पत्र शिवलिंग पर चढ़ाता है तो उसे शिव जी की कृपा बहुत शीघ्र मिल सकती है. इस तरह शिव पूजा करने वाले भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं.
- ध्यान रखें अष्टमी, चतुदर्शी, अमावस्या और रविवार को बिल्व पत्र नहीं तोड़ना चाहिए. इन दिनों में बाजार से खरीदकर बिल्व पत्र शिवलिंग पर चढ़ा सकते हैं.
- शिवलिंग पर चढ़ाए गए बिल्व पत्र बासी नहीं माने जाते हैं. एक ही बिल्व पत्र को बार-बार धोकर अगले दिन फिर से पूजा में चढ़ाया जा सकता है.
- शिवपुराण में बिल्व वृक्ष को शिव जी का ही रूप बताया गया है. इसे श्रीवृक्ष भी कहते हैं. श्री देवी लक्ष्मी का ही एक नाम है. इस कारण बिल्व की पूजा से लक्ष्मी जी की कृपा भी मिलती है. इस वृक्ष की जड़ों में गिरिजा, तने में महेश्वरी, शाखाओं में दक्षायनी, पत्तियों में पार्वती, फूलों में गौरी और फलों में देवी कात्यायनी वास करतीं हैं. इसी वजह से इस वृक्ष का पौराणिक महत्व काफी अधिक है.
बिल्व पत्र के सेवन से दूर हो सकती हैं कई बीमारियां
- उज्जैन के आयुर्वेदिक कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर डाक्टर राम अरोरा (एमडी) के अनुसार बिल्व पत्र के नियमित सेवन से हमारे शरीर में वात, पित्त और कफ नियंत्रित रहते हैं. बिल्व पत्र पाचक होते हैं. पेट की गैस समाप्त हो सकती है.
- बिल्व पत्र में पोटेशियम, फास्फटिक, लौह फास्फेट, कैल्शियम कार्बोनेट, आदि तत्व होते हैं. बिल्व पत्र वातनाशक होते हैं. इसके इस्तेमाल से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी संतुलित होती है.