Hijab Case Hearing In Supreme Court: उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने एक बार फिर दोहराया है कि विद्यालयों (Schools) को ड्रेस कोड तय करने का अधिकार है। जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस सुधांशु धुलिया की बेंच ने यह टिप्पणी कर्नाटक (Karnataka) के विद्यालयों में हिजाब (Hijab) बैन को बरकरार रखने के उच्च न्यायालय (High Court) के निर्णय के विरूद्ध पंजीकृत याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की।
‘हिजाब ड्रेस का हिस्सा नहीं है’
याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि विद्यालय में ड्रेस न पहनने की वजह से छात्राओं को प्रवेश नहीं रोका जा सकता। गोल्फ क्लब जैसे प्राइवेट क्लब ड्रेस कोड के आधार पर एंट्री रोक सकते है, पर एक सरकारी विद्यालय में बच्चों पर ड्रेस नहीं थोपी जा सकती।
प्रशांत भूषण ने बोला कि यदि विद्यालय ड्रेस कोड तय करते हैं तब भी वह मानव अधिकारों का हनन नहीं कर सकते। यहां सिखों के लिए पगड़ी,हिंदू के लिए तिलक और ईसाइयों के लिए क्रॉस को बैन नहीं किया है, केवल हिजाब को बैन करना भेदभावपूर्ण है।
करीब साढ़े चार घण्टे चली जिरह
आज हिजाब समर्थक पक्ष की ओर से करीब साढ़े चार घण्टे जिरह हुई | प्रशांत भूषण के अतिरिक्त वरिष्ठ वकील मीनाक्षी अरोड़ा, ए एम दार, जयना कोठारी, दुष्यत दवे,कॉलिन गोंजाल्विस ने दलीले रखी। दुष्यंत दवे और कपिल सिब्बल ने मामला संविधान पीठ को सौंपने की मांग की।
‘क़यामत के दिन सबके गुनाहों का हिसाब होगा’
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अब्दुल मजीद दार ने कुरान के तीन सूरे (चैप्टर) का हवाला देते हुए बोला कि इस्लाम में स्त्रियों के सिर ढकना जरूरी है। दार ने बोला कि कुरान शरीफ 1400 वर्ष पहले आई। अल्लाह का जो निर्देश है, वो सबके लिए ज़रूरी है। कुरान में कोई संशोधन नहीं किया जा सकता।
दार ने बोला कि कुरान की अहमद अली की ओर से की गई व्याख्या जिसके आधार पर उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया है, वो ग़लत और भ्रामक है। अल्लाह यदि दयावान और क्षमाशील है तो इसका मतलब ये नहीं कि उसके आदेश का पालन ही नहीं किया जाए। इसका मतलब ये नहीं कि यदि हिजाब नहीं पहनोगे तो अल्लाह माफ़ कर देगा। कुरान में दी गई शिक्षाएं जरूरी हैं। कयामत के दिन सबके कर्मों का हिसाब पुस्तक होगा। सबको अपने गुनाहों का रिज़ल्ट भुगतान ही होगा। कर्नाटक उच्च न्यायालय का ये निष्कर्ष कि वैसे हिजाब न पहनने पर कोई सजा का प्रावधान नहीं है, गलत है।
दिया गया UN कन्वेंशन का हवाला
वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने हिजाब के समर्थन में बाल अधिकारों के लिए यूएन कन्वेंशन का हवाला दिया। अरोड़ा ने बोला – ये कन्वेंशन बच्चों के धार्मिक विश्वास, उनकी सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करता है। इसमें दूसरे धर्मों, सभ्यताओं के लिए सम्मान की बात कहीं गई है। संयुक्त देश भी ये देख रहा है कि अनेक राष्ट्र कैसे इन कन्वेंशन का पालन कर रहे है। संयुक्त देश मानवाधिकार कमेटी सब राष्ट्रों पर नज़र रख रही है। 89 फ़ीसदी ईसाइयों की जनसंख्या वाले नॉर्वे ने विद्यालयों में केवल ईसाई धर्म की शिक्षाओं को पढ़ाने का निर्णय लिया लेकिन संयुक्त देश ने इसके लिए मना कर दिया। संयुक्त देश का बोलना था कि ये धर्म के आधार पर भेदभाव है। ट्यूनीशिया में जब विद्यालयों में शिक्षकों को हेडस्कार्फ़ पहनने से रोक दिया गया तब संयुक्त देश की कमेटी ने दखल दिया। शिक्षा का मकसद ही है कि हम धार्मिक रूप से सहिष्णु बनें। यदि हम उन धार्मिक परम्पराओं पर रोक लगाना प्रारम्भ कर देंगे जो नैतिकता, स्वास्थ्य के विरूद्ध नहीं है तो हम बच्चों को धार्मिक सहिष्णुता तो नहीं सीखा रहे।
‘UN कमेटी ने भी हिजाब बैन पर प्रश्न उठाया’
वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने दलील दी कि केंद्र गवर्नमेंट ने बच्चों के अधिकारों को लेकर UN इनकन्वेंशन को स्वीकृति दी है। ऐसे में राज्य गवर्नमेंट को कोई अधिकार नही है कि वो कोई आदेश जारी करें जो केंद्र गवर्नमेंट के विरूद्ध हो। संयुक्त देश की मानवाधिकार कमेटी कह चुकी है कि हिजाब पर बैन एक बच्चे के अपनी धार्मिक परम्पराओं के पालन के अधिकार का हनन है। ड्रेस कोड ऐसा होना चाहिए जो बच्चों को विद्यालय आने के लिए प्रेरित करें ना कि उन्हें रोके। फ्रांस में धर्मनिरपेक्षता का एक दूसरा ही रूप है। वहां हर तरह के धार्मिक प्रतीकों के प्रदर्शित होने पर रोक है। पर हमारा यहां ऐसा नहीं हैं। इस राष्ट्र में हम धर्म का, धार्मिक परम्पराओं का सम्मान करते हैं। क्या हिजाब किसी तरह से भी नैतिकता, क़ानून प्रबंध के विरूद्ध है।
‘दुनिया भर में हिजाब को मान्यता’
वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने बोला कि इस्लाम दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा धर्म है पूरी दुनिया में 24 प्रतिशत लोग इस्लाम को मानने वाले है। 24 से अधिक राष्ट्र इस्लामिक हैं। 34 राष्ट्रों में यह दूसरा सबसे बड़ा धर्म है। ज़्यादातर राष्ट्रों में हिजाब को धार्मिक और सांस्कृतिक पोशाक के तौर पर मान्यता है। जब पूरे विश्व में अदालतें, देश, हिजाब को मान्यता दे रहे हैं तब हम कौन होते है जो कहे कि ये इस्लाम की जरूरी धार्मिक परम्परा है या नहीं। हम सब एक ग्लोबल विलेज का हिस्सा है। कोई अकेले में नहीं रह रहे ।धार्मिक परम्पराओं की तह में न्यायालय को नहीं जाना चाहिए। इस पर जस्टिस धुलिया ने बोला कि कर्नाटक उच्च न्यायालय के सामने आपने हिजाब को इस्लाम की जरूरी धार्मिक परंपरा होने की दलील दी थी। लेकिन अब याचिकाकर्ता कह रहे है कि हाईकोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया।
दवे ने संविधान पीठ को भेजने की मांग की
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश दुष्यंत दवे ने बोला कि ये गंभीर समस्या है। संविधान पीठ को इस पर सुनवाई करनी चाहिए। इस मुद्दे में जिरह की समय सीमा तय मत कीजिए। ये लाखों लोगो की जीवन से जुड़ा समस्या है।
दवे ने बोला कि इस मुद्दे को लेकर राज्य गवर्नमेंट की संजीदगी का ये आलम है कि उन्होंने लिखित उत्तर दाखिल करने की भी ज़रूरत नहीं समझी जबकि हर दूसरे मुद्दे में वो जबाब दाखिल करने के लिए वक़्त मांगते रहते हैं। उच्च न्यायालय में भी उन्होंने उत्तर दाखिल किया था, पर उच्चतम न्यायालय में उन्होंने उत्तर दाखिल नहीं किया।
सुप्रीम न्यायालय में मुद्दे की सुनवाई सोमवार को भी जारी रहेगी।