Dushyant Chautala JJP Crisis : गवर्नमेंट से बाहर होने के साथ ही जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) के प्रमुख दुष्यंत चौटाला मुश्किलों से
ऐसा करने के साथ ही बीजेपी ने मुख्यमंत्री खट्टर के विरुद्ध बने माहौल को कुछ हद तक हल्का करने की प्रयास की है। लोकसभा चुनाव के ठीक पहले हुई इस कार्रवाई का लाभ बीजेपी को मिल भी सकता है। हालांकि, हरियाणा की राजनीति पर नजर रखने वालों का मानना है कि बीजेपी का ताजा एक्शन सिर्फ़ दिखाने के लिए है। भाजपा-जेजेपी, दोनों अभी भी एक-दूसरे के साथ हैं। सैनी के विश्वास मत के समय जेजेपी ने अपने दल के सभी विधायकों को मतदान से बाहर रहने का व्हिप जारी किया था। मतलब साफ था कि बहुमत केवल 80 एमएलए के बीच होना था।
हरियाणा विधानसभा में कुल 90 सीटें हैं। इस तरह सैनी के सामने बहुमत साबित करने की कोई चुनौती नहीं थी। वे सरलता से बहुमत पा गए। जबकि होना यह चाहिए था कि जब जेजेपी गवर्नमेंट में शामिल नहीं थी तो वह विपक्ष में वोट करती। पर, ऐसा नहीं हुआ। इस अनजाने समझौते का सच क्या है, यह तो भाजपा-जेजेपी के नेतागण ही जानें लेकिन दुष्यंत चौटाला के लिए लोकसभा चुनाव की डगर बिल्कुल से सरल नहीं है। मुश्किलें उनके सामने इसलिए खड़ी हैं क्योंकि उनके सभी विधायक एकजुट नहीं दिखाई दे रहे हैं। हिसार में 13 मार्च को हुई जनसभा में सब नहीं पहुंचे तो दिल्ली में हुई बैठक से भी कई विधायक गैरहाजिर रहे। नायब सैनी के विश्वास मत हासिल करने के दौरान भी कुछ जेजेपी विधायक सदन में पहुंचे थे, जबकि उन्हें वहां नहीं होना था। अंत समय में विधायकों की एकजुटता पार्टी के लिए अर्थ रखती है, पर ऐसा होता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है। ऐसा लगता है कि पार्टी के अंदर सब कुछ सामान्य नहीं है।
जाट समुदाय के विरुद्ध रहा रुख
एक और जरूरी पहलू यह है कि जिन जाट वोटों के सहारे दुष्यंत विधानसभा में दस सीट जीतने में पहली बार सफल हुए थे, पूरे करीब साढ़े चार वर्ष उन्हीं के विरुद्ध काम करते रहे। जाट समुदाय के किसी भी आंदोलन में उनकी भागीदारी नहीं देखी गई। न ही किसानों के आंदोलन में और न ही पहलवान बेटियों के आंदोलन में, यह दोनों आंदोलन जाट अस्मिता से जुड़े हुए थे या यूं कहिए कि अभी भी हैं। पूरी की पूरी हरियाणा गवर्नमेंट किसान आंदोलन के विरुद्ध खड़ी रही। कानून-व्यवस्था के नाम पर किसानों के राह में रोड़े अटकाए। लठियां चलीं। दुष्यंत गवर्नमेंट में डिप्टी मुख्यमंत्री थे लेकिन मौन रहे। ऐसे में यह चुनाव जेजेपी और उसके प्रमुख दुष्यंत के लिए चुनौतियों से भरा होने वाला है।
यद्यपि, हरियाणा का चौटाला परिवार राजनीति ही करता आ रहा है। अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। राजनीति में दुष्यंत चौथी पीढ़ी के सदस्य हैं। मतलब इनके लिए सियासी जोड़-तोड़ आम है। सत्ता में बने रहने के लिए चौटाला परिवार ने अनेक बार भांति-भांति के गठबंधन किए हैं। चौधरी देवीलाल सियासी खिलाड़ी के रूप में हरियाणा के मुख्यमंत्री से लेकर राष्ट्र के डिप्टी पीएम तक बने। जब वे डिप्टी पीएम बने तो भी केंद्र में गठबंधन की ही गवर्नमेंट थी। उनके पुत्र ओमप्रकाश चौटाला भी कई बार मुख्यमंत्री बने। अनेक घपले-घोटालों और विवादों में भी रहे। कारावास गए। फिर छूटे। सजा काटी। ओमप्रकाश चौटाला के पुत्रों अभय और अजय पिता द्वारा स्थापित भारतीय नेशनल लोकदल के बैनर तले राजनीति करते रहे लेकिन कालांतर में दोनों भाइयों में मतभेद सामने आया और अजय चौटाला के पुत्र दुष्यंत ने जननायक जनता पार्टी का गठन कर चुनावी मैदान में उतरने का निर्णय किया। दुष्यंत पहली बार 2014 में महज 26 वर्ष कि उम्र में हिसार से संसद सदस्य चुने गए। वर्ष 2019 के चुनाव में उन्हें बीजेपी ने हरा दिया लेकिन इसी वर्ष हुए विधानसभा चुनाव में वे किंगमेकर बनकर उभरे और बीजेपी की गवर्नमेंट बनवाकर डिप्टी मुख्यमंत्री बने। उनके पिता तो राजनीति में कुछ खास नहीं कर पाए लेकिन दादा ओमप्रकाश चौटाला पांच बार हरियाणा के मुख्यमंत्री बने थे।
दुष्यंत के सामने तीन बड़ी चुनौतियां
अब दुष्यंत के सामने चुनौती के रूप में तीन जरूरी बिंदु हैं। लोकसभा चुनाव, उसके ठीक बाद विधानसभा चुनाव और स्वयं की पार्टी को स्थापित करना या विस्तार देना। यदि लोकसभा चुनाव में वे कुछ भी हासिल कर पाते हैं तो निश्चित ही कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ेगा। हालांकि, अकेले चुनावी मैदान में बहुत आशा नहीं है। यदि गवर्नमेंट में न होते तो आसार अधिक बनती। ऐसे में बताया जा रहा है कि वर्ष 2019 में बीजेपी गवर्नमेंट बनवाने और नायब सैनी के विश्वास मत से दूर रहने का पुरस्कार उन्हें लोकसभा में मिल सकता है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो वे उसी केंद्र और राज्य गवर्नमेंट के विरुद्ध चुनावी रैलियों में बोलेंगे जिसकी मलाई वे सत्ता में बैठकर खाते रहे। फिर विधानसभा चुनाव अक्टूबर में होने की आसार है। ऐसे में यही रुख उन्हें बरकरार रखना होगा। नया दल बनाने और उसे स्थापित करने की स्वयं में एक अलग चुनौती होती है। यदि दल नया है और सत्ता में है तो चीजें सरल होती हैं लेकिन नया दल है और सत्ता से दूरी है तब तो कार्यकर्ताओं को एकजुट करने में ही नेताओं के पसीने छूटते हैं। देखना रोचक होगा कि यंग लीडर के रूप में दुष्यंत चौटाला किस ढंग से इनसे निपटते हैं? किसी गठबंधन हिस्सा बनते हैं या फिर अकेले चुनाव मैदान में उतरते हैं?