जनाब, शाह-रुख़ खान के जैसा होना कौन नहीं चाहेगा भला? दौलत, शोहरत, नाम, पहचान, रुतबा और दीवानों की तरह आगे-पीछे भागते लोगों का हुज़ूम। किसी अदना आदमी के ख़्वाब में भी ये अनेक बड़ी चीज़ें होती होंगी। पर मिलती किसे हैं? यक़ीनन चंद ‘शाह-रुख़ जैसे क़िस्मत वालों’ को। लेकिन जनाब, सोचा है क्या कभी, कि दसियों वर्ष में कोई एक बहुत नाचीज़ सा शख़्स ‘शाह-रुख़ जैसी क़िस्मत वाली शख़्सियत’ में कैसे परिवर्तित हो जाता है? ख़ुद शाह-रुख़ की ही ज़िंदगी के क़िस्सों में इस प्रश्न के ज़वाब मौज़ूद हैं। और इन क़िस्सों का लुब्ब-ए-लुबाब (सार-तत्त्व) यूं कि ‘हिचकियों’ से हारिए मत। बद-क़िस्मतियों से डरिए मत। उन्हें कोसते रहने के ब-जाए उठिए। उनसे मुक़ाबला कीजिए। और शाह-रुख़ की तरह वह सब हासिल कर लीजिए जो उन्होंने अपनी ज़िंदगी में किया है। मगर हां, एक बात और। ना-कामयाबी के लिए तैयार रहना, ऐसी सफलता की पहली शर्त है।
इसके बाद अब जाइज़ा कीजिए शाह-रुख़ की ज़िंदगी के क़िस्सों पर। ये क़िस्से ख़ुद उन्हीं ने सुनाए हैं। कभी किसी साक्षात्कार की शक़्ल में। कभी उनकी ज़िंदगी पर पुस्तक लिखने वालों को। और कभी तो किसी नामी यूनिवर्सिटी में सबक देते हुए। पढ़ने वाले बच्चों को ज़िंदगी का फ़लसफ़ा बताते हुए। उन्हें ज़िंदगी जीने का श’ऊर सिखाते हुए। ऐसे ही वर्ष 2018 का मौक़ा। एक फिल्म आई थी उस वक़्त ‘हिचकी’। कई फिल्मों में शाह-रुख़ की हीरोइन रहीं रानी मुखर्जी ने इस फिल्म में वह चुनौतीपूर्ण किरदार अदा किया, जिसका शाह-रुख़ ने अस्ल ज़िंदगी में हर वक़्त सामना किया है। हिचकने, हकलाने जैसी दिक़्क़त के बावजूद अपनी बात सबके सामने रखने की चुनौती। वह भी पुर-असर ढंग से। सो, ज़ाहिर सी बात थी कि फिल्म के प्रमोशन के लिए रानी मुखर्जी को शाह-रुख़ से वार्ता करने की सूझी। रानी ने उनसे पूछा कि अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा ‘हिचकी मोमेंट’ बताइए?
इस पर शाह-रुख़ का ज़वाब सुनिए, ‘मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा ‘हिचकी मोमेंट’ वह था, जब मेरे माता-पिता का इंतिक़ाल हुआ। मैं 15 का था, जब मेरे पिता का मृत्यु हुआ। और 24 वर्ष का था, जब मां चल बसी। अचानक चले गए दोनों। एकदम ठीक से लग रहे थे। पर अचानक पता चला कि उन्हें कैंसर है और बीमार होने के ढाई महीने के भीतर ही उनका इंतिक़ाल हो गया। मुझे कुछ समझ नहीं आया तब, कि अब करूं क्या। तभी एक रोज़ जब मां-बाप की मज़ार पर दुआ करते वक़्त ख़्याल आया कि इस खालीपन को किसी चीज़ से भरना चाहिए। बहुत तक़लीफ़ में था मैं, उसे मुझे बाहर निकालना ज़रूरी था। क़िस्मत से तभी मुझे अदाकारी करने का मौका मिला। तो मुझे वह ज़रिया मिल गया, जिससे मैं अपने जज़्बात ज़ाहिर कर सकता था। अपनी तक़लीफ़, अपनी ख़ुशी बाहर निकाल सकता था। तो इस तरह, मेरे लिए अदाकारी कोई पेशा नहीं रही। बल्कि, ज़रिया बनी’।
‘मेरी ज़िंदगी में जब भी ऐसे ‘हिचकी-मोमेंट’ आए, मैंने सबसे पहले तो उन्हें स्वीकार किया। ख़ुद से बोला कि यार, अब ये तो हो गया, जो होना था। लेकिन इस ‘हिचकी’ की वज़ह से मैं ख़ुद को हारने की इजाज़त नहीं दे सकता। मुझे हमेशा से लगता रहा और मैं मानता भी हूं कि ख़ुदा जब ये ज़िंदगी देता है तो वह ‘हिचकियों’ के साथ ही साथ, उनसे पार पाने के ज़रिए भी देता है। मुझे भी मेरे सामने ज़रिया दिखा और मैं उनसे पार पाता गया’। पर जनाब, ये सब अकेले-दम शाह-रुख़ के हुआ, ऐसा ख़ुद वे भी नहीं मानते। बल्कि इस मसले पर तो वे अपनी ही फिल्म का एक डायलॉग दोहराते हैं, ‘अगर किसी चीज़ को दिल से चाहो तो पूरी काइनात तुम्हें उससे मिलाने की क़ोशिश में लग जाती है’। इसी तरह, एक बार मौक़ा मिलता है, तो विज्ञापन की दुनिया के बड़े प्रसिद्ध नाम पीयूष पांडे के साथ बातचीत के दौरान शाह-रुख़ इसी डायलॉग को परत-दर-परत खोलकर दिखाते हैं।
‘मुझे याद है, जब मैं टेलीविज़न में काम करने मुुंबई आया तो मेरे पास रहने को स्थान नहीं थी। मैं मुंबई पहली बार आया था, मुझे एड्रेस नहीं मालूम था, जहां जाना था। तो एयरपोर्ट पहुंच गया। उस दौर में कुंदन, बकुल, अज़ीज़, सईद और उनके परिवार ने मेरी सहायता की। मुझे अपना घर दिया। पहले ऑफ़िस में रखा, बांद्रा में। फिर जब मेरी विवाह हो गई तब भी मेरे पास घर नहीं था। तब अज़ीज़ मिर्ज़ा ने मुझे अपना घर दिया। मैं ये बातें इसलिए बताना चाहता हूं क्योंकि ये लाेग मेरे फिल्म-मेकर्स नहीं हैं, ये मेरे लाइफ़-मेकर्स हैं। मैं यहां होता ही नहीं, यदि ये मेरी ज़िंदगी में न होते। और ये मैं इनकी तारीफ़ के लिए नहीं कह रहा हूं। अपने स्वार्थ के लिए कह रहा हूं। क्योंकि मैं इन सबके साथ बने रहना चाहता हूं। मैं इन सबके लिए अपने जज़्बात किसी तरह ज़ाहिर करना चाहता हूं। क्योंकि बहुत से लोग हैं, जिन्हें नहीं पता कि शाह-रुख़ खान आज जो है, उसे किस-किस ने मिलकर बनाया है’।
‘फिर बाद में अज़ीज़ को भी घर की दिक़्क़त आई तो उन्हें अपना वाला वापस लेना पड़ा। तब मेरे पास फिर रहने का घर नहीं था। किराया देने के लिए पैसे भी नहीं थे। तब मेरे दोस्त राजीव ने मेरे घर का किराया दिया। ऐसे ही लोगों की वजह से मुझे लगातार ख़ुद पर यह भरोसा होता रहा कि मैं मुंबई में मूवी स्टार बन सकता हूं। एक बड़ी फेमस लाइन है। उसे मेरी दोस्त अनुपमा ने शायद अपनी पुस्तक में भी लिखा है कि- मैं एक दिन मुंबई को ओन करूंगा। मुंबई पर राज करूंगा। वो हौसला कहने या सोचने की इसलिए थी कि क्योंकि इन सबका साथ था मुझे। मुझे कुछ पता नहीं था। जब मैं विवाह करने वाला था, तो मुझे याद है, मेरे एक दोस्त ने मुझे टोका था। कहा था- तुम शादी करने वाले हो, शादी-शुदा हीरो में चलता नहीं है। पर अब तो विवाह हो गई थी, अब क्या करते। तो, वही लोग फिर मेरे साथ मेरी ख़ुशी, मेरे सफ़र में मेरे साथ शरीक भी होते हैं और मुझे आगे लेकर जाते हैं’।
‘मुझे याद है, अब्बास-भाई, मस्तान-भाई ने किन मुश्किलों का सामना कर के ‘बाज़ीगर’ (1993), बनाई। मेरी ज़िंदगी की पहली बड़ी कामयाब फिल्म, जिसने मुझे स्टार बनाया। लेकिन उन लोगों ने मुझे अपनी दिक़्क़तों का एहसास तक नहीं होने दिया कभी। पूरी फिल्म-मेकिंग के दौरान। ऐसे ही, बहुत से लोग हैं, जिन्होंने मुझे वह बनाया, जो आज मैं हूं। इसीलिए मैं कहता हूं, मेरी सफलता में मेरा कोई हक़ नहीं है ज़्यादा… इसी तरह, दिल्ली का शुरुआती दौर भी। मेरे पिता जी का इंतिक़ाल हो गया था। हमें घर से बे-घर कर दिया गया था। उन दिनों मैं सिनेमाघर में थोड़ी-बहुत अभिनय करने लगा था। तभी, जब बिल्कुल से घर की ज़रूरत आन पड़ी तो हमारे एक परिचित थे, वे घर ढूंढ़ने में मां की मदद कर रहे थे। उसी दौरान एक घर मां को ठीक लगा तो उन्होंने उनसे कहा- मेरा बेटा नहीं है अभी, जब वह आ जाएगा तो उसे ये घर दिखाकर हम बता देंगे, इस बारे में।’
‘तब वे मां से बोले- कहां है आपका बेटा। तो उन्होंने बताया- अभिनय करने गया है। तो वे बोले- अच्छा, मेरे ससुर-साहब एक सीरियल बना रहे हैं। उससे कहो यहां आ के अभिनय कर ले। उनके ससुर-साहब कर्नल कपूर थे। वे ‘फ़ौजी’ सीरियल बना रहे थे। उन्होंने मेरा ऑडीशन लिया और मुझे एक भूमिका दे दिया। उस किरदार में मेरा काम ये था कि मैं हर बार कोई न कोई ग़लती करूंगा। इस वज़ह से सीरियल में कर्नल का भूमिका निभा रहे अदाकार मुझे सज़ा देंगे कि जाओ, सामने जो पेड़ लगा है उस पर गिनकर आओ, कितने कौवे हैं। तो मैं भाग के जाता हूं और लौटकर बताता हूं कि चार कौवे हैं। फिर वह कहते हैं- ठीक है जवान, अब सावधान। मेरा पूरे सीरियल में बस, इतना ही काम था। मुझे बड़ा अजीब लगा कि यार, मैं कैसे आ के अपने घरवालों को बताऊंगा कि मैं कौवे गिनने का रोल कर रहा हूं। पर मैं जानता हूं कि मेरी बहुत चीज़ें क़िस्मत की वज़ह से भी हुई’।
‘मिसाल के तौर पर वही ‘फ़ौजी’ सीरियल, जिसमें मैं प्रारम्भ में कौवे गिन रहा था। उसमें कर्नल कपूर के बेटे जो थे, वे अभिमन्यु राय का लीड रोल कर रहे थे। वही कैमरा संभाल रहे थे। अचानक उन्हें लगा कि मुझसे दोनों काम नहीं होंगे और उन्होंने फ़ैसला किया कि केवल कैमरा ही संभालेंगे। सीरियल की सिनेमैटोग्राफ़ी ही करेंगे। तब कर्नल कपूर को कोई और अभिनेता नहीं मिला तो उन्होंने मुझे बुलाया और बोला कि अब तुम ये लीड रोल करोगे, इस तरह मैं रातों-रात अभिमन्यु राय हो गया…’। तो जनाब, ये, शाह-रुख़ की ज़िंदगी की कुछ झलकियां थीं। इन्हें देखने, समझने, इनके बारे में जानने और इनसे कुछ सीखने के लिए उन्हें वक़्त-वक़्त पर दुनिया के बड़े-बड़े मैनेजमेंट-इंस्टीट्यूशन में बुलाया जा चुका है। बुलाया जा रहा है। क्योंकि बहुतों को लगता है कि शाह-रुख़ की जीवन में जीवन-प्रबंधन यानी लाइफ़-मैनेजमेंट के बहुत से सिरे बिखरे मिल जाते हैं, जिन्हें थामकर ज़िंदगी में आगे बढ़ा जा सकता है। कभी मौक़ा लगा तो ‘दास्तान’ में भी उन सिरों पर बात करेंगे यक़ीनन। पर…