नव संशोधित आपराधिक कानून भारतीय इन्साफ संहिता, 2023, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 और भारतीय नागरिक सुरक्षा (द्वितीय) संहिता, 2023 पर रोक लगाने की मांग करते हुए उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दाखिल की गई थी. याचिका दिल्ली के दो निवासियों अंजले पटेल और छाया द्वारा दाखिल की गई थी, जिसमें तीन कानूनों के शीर्षकों पर विरोध जताई गई थी और उन्हें अस्पष्ट और परफेक्ट नहीं कहा गया था. तीन कानूनों के नाम क़ानून या उसके मकसद के बारे में नहीं बताते हैं. तीन कानूनों पर रोक लगाने की मांग करते हुए याचिका में दिसंबर 2023 में संसद में विधेयकों के पारित होने में अनियमितता का भी इल्जाम लगाया गया.
शीर्ष न्यायालय ने 20 मई को वकील विशाल तिवारी द्वारा दाखिल एक याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया था, जिसमें तीन कानूनों को चुनौती दी गई थी, जिसमें दावा किया गया था कि ऐसी चुनौती समय से पहले है क्योंकि कानून अभी भी लागू नहीं हुए हैं. वर्तमान याचिका में नए कानूनों के कुछ प्रावधानों को उच्चतम न्यायालय के फैसलों का उल्लंघन बताते हुए चुनौती भी दी गई है. इसमें भारतीय नागरिक सुरक्षा (द्वितीय) संहिता, 2023, (बीएनएसएस) के प्रावधान का उल्लेख किया गया है, जो 60/90 दिनों की अवधि के शुरुआती 40/60 दिनों की अवधि के दौरान आंशिक रूप से या पूरी तरह से 15 दिनों की पुलिस हिरासत का फायदा उठाने की अनुमति देता है.
याचिका में इल्जाम लगाया गया है कि यह मामला कि क्या पुलिस हिरासत को गिरफ्तारी से पहले 15 दिनों तक सीमित रखा जाना चाहिए, 1992 में CBI बनाम अनुपम जे कुलकर्णी मुद्दे में उच्चतम न्यायालय के निर्णय में तय किया गया था, जिसे पिछले वर्ष एक बड़ी पीठ को पुनर्विचार के लिए भेजा गया है. इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं ने इल्जाम लगाया कि 15 दिनों की पुलिस हिरासत की अनुमति देने के नए नियम से पुलिस के इस दावे पर जमानत से इनकार किया जा सकता है कि उन्हें अभी भी 15 दिनों की हिरासत अवधि खत्म नहीं हुई है.