गोवर्धन पूजा इस साल 26 अक्टूबर को मनाई जाएगी। हालांकि हर वर्ष गोवर्धन पूजा दीपावली के अगले दिन मनाए जाने का नियम है, लेकिन इस बार मंगलवार (25 अक्टूबर) को सूर्य ग्रहण लगने की वजह से गोवर्धन पूजा की तिथि बढ़ी है। ऐसा संयोग 27 वर्ष बाद बन रहा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण ने पृथ्वीवासियों को देवराज इंद्र के प्रकोप से बचाने के लिए और उनके अहंकार को तोड़ने के लिए अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाया था। इसके बाद से गोवर्धन पूजा की परंपरा प्रारम्भ हुई।
वहीं, बुंदेलखंड में भी गोवर्धन पूजा मनाने की परंपरा बहुत पुरानी है। इतिहासविद हरगोविंद कुशवाहा ने बताया कि इस दिन महिलाएं गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत और श्री कृष्ण का आकार बनाती हैं। इसके साथ ही पेड़, गाय, बछड़ा, ग्वाले के साथ ही सृष्टि में जितनी चीजें होती हैं, उन सब के छोटे आकार बनाए जाते हैं। इन सभी वस्तुओं की पूजा की जाती है। इसके साथ ही गोवर्धन का जो आकार बनाया जाता है, उसके बीच में ही एक गड्ढा कर दूध और दही रखा जाता है। इस दूध दही को ही बच्चों को प्रसाद के रूप में खिलाया जाता है।
झांसी के पंडित मनोज थापक ने बताया कि 26 अक्टूबर को सुबह 6:31 बजे से सुबह 8:45 बजे तक गोवर्धन पूजा का शुभ मुहूर्त रहेगा। सुबह स्नान करने के बाद गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाएं। पर्वत के पास ही ग्वाल बाल की आकृति बनाएं और वहीं श्री कृष्ण की मूर्ति स्थापित करें। शुभ मुहूर्त में एक थाल में जल, मौली, रोली, चावल, फूल, दही और ऑयल का दीपक जलाकर पूजा करें और गोवर्धन पर्वत की आकृति की सात बार परिक्रमा करें। प्रसाद में दूध, घी, शक्कर, दही और शहद से बना पंचामृत चढ़ाएं। इसके साथ पंडित मनोज थापक ने बोला कि गोवर्धन पूजा कभी भी बंद कमरे में नहीं करनी चाहिए। गोवर्धन पर्वत घर के आंगन में ही बनाना चाहिए