यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद पूरी दुनिया वहां तबाही का मंजर देख रही है और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के आक्रामक रवैये को देखकर हर कोई इस बात को लेकर आशंकित है कि कहीं यह विश्वयुद्ध का स्वरूप न ले ले. रूस का सबसे घनिष्ठ मित्र राष्ट्र होने के नाते दुनिया की नजर हिंदुस्तान की भूमिका पर भी टिकी है. इस मुद्दे पर पूर्व विराष्ट्र मंत्री यशवंत सिन्हा से भाषा के पांच प्रश्न और उनके उत्तर:-
प्रश्न: यूक्रेन पर रूसी सैन्य कार्रवाई जारी है. दुनिया आशंकित है कि कहीं यह तीसरे विश्वयुद्ध का स्वरूप न ले ले. आपकी प्रतिक्रिया?
उत्तर: सबकी चिंता यही है कि कहीं यह विश्वयुद्ध में परिवर्तित न हो जाए और विश्वयुद्ध होने का मतलब है परमाणु युद्ध. यह होता है तो और कितने लोग मारे जाएंगे, उसकी कोई गिनती नहीं होगी. इसलिए, पश्चिमी राष्ट्र खासकर जिनका असर यूरोप में है, वे नहीं चाहते हैं कि संघर्ष इतना बढ़ जाए कि उनकी सेना को इसमें भाग लेना पड़े. नाटो ने एक सही रास्ता पकड़ा है. वह संघर्ष नहीं बढ़ाना चाहता. लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है. वह यह कि एक बहुत ही संदेह्तिशाली राष्ट्र और उसकी सेना ने एक छोटे से राष्ट्र पर आक्रमण कर दिया है तथा उसकी स्वतंत्रता को चुनौती दे रहा है. यह सभी अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के उल्टा है. ऐसे में यदि ज्यादा संदेह्तिशाली राष्ट्र, कम संदेह्तिशाली राष्ट्र को झुका दे और अपनी बात मानने के लिए विवश कर दे तो फिर यह जंगलराज हो जाएगा. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जो भी एक अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था बनी है, वह खत्म हो जाएगी.
प्रश्न: इस युद्ध के लिए आप किसे गुनाही मानते हैं
?उत्तर: हमें इस बात को स्वीकार करना होगा कि पश्चिमी राष्ट्रों की तरफ से भी बहुत उकसाया गया (यूक्रेन को). रूस को घेरकर रखने की उसकी (पश्चिमी राष्ट्रों) जो मंशा है।।।वह यूक्रेन को नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) में शामिल कर रूस को घेरने की तैयारी कर रहे थे. यूक्रेन में बहुत बड़े-बड़े परमाणु संयंत्र हैं और इसका यूक्रेन के साथ-साथ रूस के लिए भी काफी महत्व है. इसी सबसे चिंतित होकर रूस ने आक्रमण कर दिया. मेरा यह कहना है रूस की चिंता सही थी लेकिन उसका तरीका गलत है. उनको (रूस) प्रयास करनी चाहिए थी कि वार्ता से रास्ता निकले. वार्ता से रास्ता निकालने में यदि दूसरे राष्ट्रों की सहायता उन्हें चाहिए थी तो वह भी लेनी चाहिए थी. जैसे अभी फ्रांस के राष्ट्रपति प्रयास कर रहे हैं. रूस, हिंदुस्तान की सेवाओं का इस्तेमाल भी कर सकता था. वह हिंदुस्तान से हस्तक्षेप करने को कह सकता था. वह हिंदुस्तान को कह सकता था कि वह इस दिशा में प्रयास करे ताकि रूस की सुरक्षा पर खतरा न हो.
प्रश्न: हिंदुस्तान के अब तक के रुख का आप कैसे आकलन करेंगे?
उत्तर: रूस से हमारी बहुत पुरानी दोस्ती है. वह हर मौके पर हिंदुस्तान के कार्य इनकमा है. वह हमारा बहुत ही बहुमूल्य दोस्त है, इसमें कोई संदेह नहीं है. लेकिन बहुत निकटी दोस्त भी यदि गलती करता है तो दोस्त के नाते हमारा अधिकार बनता है कि हम उसको कहें कि भाई यह गलती मत करो. अभी तक ऐसा कोई सबूत सामने नहीं इनकमा है कि हिंदुस्तान गवर्नमेंट ने ऐसा कुछ किया है. संघर्ष शुरू होने के तुरंत बाद हमारे विराष्ट्र मंत्री को वहां जाना चाहिए था और प्रयास करनी चाहिए थी कि समस्या का हल वार्ता से निकले. लेकिन ऐसी कोई पहल हिंदुस्तान की ओर से नहीं हुई. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अन्य मंचों पर हिंदुस्तान मतदान से दूर रहा है. इससे ऐसा लगता है कि जैसे गलत कार्य में हम रूस का साथ दे रहे हैं. इस स्थिति से बचा जा सकता था.
प्रश्न: यूक्रेन में फंसे विद्यार्थीों को वापस लाने के लिए ‘ऑपरेशन गंगा’ चलाया जा रहा है. बावजूद इसके अभी भी यूक्रेन में सैकड़ों की तादाद में विद्यार्थी फंसे हुए हैं और विभिन्न सोशल मीडिया माध्यमों से सहायता की गुहार लगा रहे हैं. इस बारे में आपकी राय?
उत्तर: हिंदुस्तान गवर्नमेंट को और हम सब लोगों को पता था कि वजनी संख्या में हमारे विद्यार्थी वहां पढ़ने जाते हैं. खासकर मेडिकल की पढ़ाई के लिए. दूसरी बात यह है कि हिंदुस्तान गवर्नमेंट के पास सूचना होगी कि रूस आक्रमण करने वाला है और हमारे विद्यार्थी यदि समय रहते नहीं निकले तो वहां फंस जाएंगे. इसलिए समय रहते उनको निकाल लेना चाहिए था. उन्हें निकलने के लिए बाध्य करना करना चाहिए था न कि उन्हें उनके विवेक पर छोड़ना चाहिए था. इसके बावजूद कोई नहीं निकलता वहां से, तब हम कह सकते थे कि उसकी गलती है. इस पूरी प्रक्रिया में गंगा का पानी जब सिर के ऊपर से निकलने लगा तब गवर्नमेंट का ‘ऑपरेशन गंगा’ शुरू हुआ
.प्रश्न: रूस और अमेरिका के संरेट्भ में हिंदुस्तान की विराष्ट्र नीति की आप कैसे समीक्षा करेंगे तथा चाइना से मिल रही चुनौती के मद्देनजर इसकी दिशा क्या होनी चाहिए?
उत्तर: नयी विश्व व्यवस्था यदि बनती है तो उसमें हिंदुस्तान बहुत निर्बल स्थिति में हो जाता है. क्योंकि यदि इसी तरह ज्यादा संदेह्तिशाली राष्ट्र, दूसरे राष्ट्र के ऊपर आक्रमण करें तो कल चाइना को भी यह मौका मिलेगा कि वह ताइवान के ऊपर हमला करे या हमारे यहां लद्दाख और अरुणाचल में. अरुणाचल खास तौर पर. क्योंकि चाइना दावा करता रहा है कि अरुणाचल उसका है. तो कल वह यदि बलपूर्वक अरुणाचल को हथियाने के लिए अपनी सेना भेजे तो फिर क्या होगा? दूसरी बात यह है कि जिस तरह दुनिया यूक्रेन के मामले में तटस्थ रह गई, उसी प्रकार वह हिंदुस्तान और चाइना के मामले में भी रह जाएगी. नयी विश्व व्यवस्था बनती है तो उसमें सब राष्ट्र स्वयं की चिंता करने के लिए छोड़ दिए जाएंगे. हिंदुस्तान को चाइना को लेकर जरूर चिंता करनी चाहिए और पूरे व्यवस्था करने चाहिए. हमें गफलत में नहीं रहना चाहिए.