सुप्रीम न्यायालय ने साफ बोला कि चुनाव के बीच जो हिंसा हो रही है वो ठीक नहीं है. निष्पक्ष रूप से चुनाव कराना ही लोकतंत्र की पहचान है. उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल का चुनाव आयोग और ममता गवर्नमेंट दोनों ने ही उच्च न्यायालय के निर्णय पर आपत्ति जताया था.
जोर-शोर से विपक्षी एकता की कवायद में जुटी पश्चिम बंगाल की सीएम ममता को उच्चतम न्यायालय ने तगड़ा झटका दिया है. पंचायत चुनाव से पहले हो रही हिंसा को लेकर केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती के मुद्दे में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कलकत्ता उच्च न्यायालय के निर्णय में दखल देने से इन्कार कर दिया है. इस मामले पर ममता गवर्नमेंट की याचिका खारिज कर दी. बीजेपी की केंद्र गवर्नमेंट पर लोकतंत्र को खतरे में डालने की दुहाई देने वाले विपक्षी दलों के लिए चुनावी हिंसा पर ममता के विरूद्ध दिए इस निर्णय को पचाना आसान नहीं होगा. ममता बनर्जी को मिली इस शिकस्त को विपक्षी दलों की एकता के प्रयासों को तगड़ा झटका लगना निश्चित है. बीजेपी इस मुद्दे को विपक्षी दलों के विरूद्ध भुनाए बगैर नहीं रहेगी. बीजेपी करप्शन के मुद्दों को लेकर पहले ही विपक्षी दलों पर हमलावर रही है. अब चुनाव जीतने के लिए हिंसा का सहारा लेने के आरोप का मौका ममता बनर्जी ने बीजेपी को दे दिया. उच्चतम न्यायालय ने जो तल्ख टिप्पणी की है वह भी विपक्षी दलों के लिए कठिनाई का सबब बनेगी.
सुप्रीम न्यायालय ने साफ बोला कि चुनाव के बीच जो हिंसा हो रही है वो ठीक नहीं है. निष्पक्ष रूप से चुनाव कराना ही लोकतंत्र की पहचान है. उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल का चुनाव आयोग और ममता गवर्नमेंट दोनों ने ही उच्च न्यायालय के निर्णय पर आपत्ति जताया था. उच्चतम न्यायालय ने दोनों से ये प्रश्न भी किया है कि जब आप अपने पड़ोसी राज्यों से फोर्स मांग रहे हैं तो फिर आपको केंद्रीय सुरक्षा बलों से क्या कठिनाई है. ममता बनजी के साल 2011 से सत्ता में आने के बाद पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा का तांडव जारी है. तत्कालीन वाम मोर्चा गवर्नमेंट के दौरान हिंसा की पीड़ा झेल चुकी ममता बनर्जी की पार्टी भी चुनावी हिंसा को लेकर लगातार कटघरे में है. विगत विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद पश्चिम बंगाल के विभिन्न हिस्सों में कई लोग मारे गए थे. ऐसी चुनावी हिंसा के लिए कभी बिहार और यूपी बदनाम थे. टीएन शेषन के मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के बाद इन दोनों राज्यों में चुनावी हिंसा पर काफी हद तक लगाम लगी थी. दूसरे शब्दों में कहें तो शेषन ने अपने मजबूत इरादों से राष्ट्र में चुनावी हिंसा को लगभग इतिहास का विषय बना दिया. इसके बावजूद पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा का दौर समाप्त नहीं हो सका.
पश्चिम बंगाल में चाहे पंचायत चुनाव हों या फिर लोकसभा या विधानसभा चुनाव, यहां हिंसा अपरिहार्य बन चुकी है. नेशनल अपराध रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) ने 2018 की अपनी रिपोर्ट में बोला था कि राष्ट्र में होने वाली 54 सियासी हत्याओं के मामलों में से 12 बंगाल से जुड़े थे. उसी वर्ष केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य गवर्नमेंट को जो एडवाइजऱी भेजी थी, उसमें बोला गया था कि पश्चिम बंगाल में सियासी हिंसा में 96 हत्याएं हुई हैं और लगातार होने वाली हिंसा गंभीर चिंता का विषय है. उस रिपोर्ट में बोला गया था कि साल 1999 से 2016 के बीच पश्चिम बंगाल में हर वर्ष औसतन 20 सियासी हत्याएं हुई हैं. केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक़, साल 2018 के पंचायत चुनाव के दौरान 23 सियासी हत्याएं हुई थीं. साल 1998 में ममता बनर्जी की ओर से टीएमसी के गठन के बाद वर्चस्व की लड़ाई ने हिंसा का नया दौर प्रारम्भ किया. उसी वर्ष हुए पंचायत चुनावों के दौरान कई इलाक़ों में भारी हिंसा हुई.
ममता बनर्जी गवर्नमेंट केवल चुनावी हिंसा ही नहीं बल्कि करप्शन और राज्य में हुए गंभीर अपराधों के आरोपों से भी घिरी रही है. राष्ट्र में पश्चिम बंगाल एकमात्र ऐसा राज्य है जहां एनआईए सर्वाधिक मामलों की जांच कर रही है. इनमें सांसद अर्जुन सिंह के घर बम विस्फोट कांड, मोमिनपुर हिंसा के दो मामले, बीरभूम में 81 हजार जिलेटिन की छड़ें बरामद होने का मामला, रामनवमी में हिंसा के 6 मामले, लश्कर आतंकी तान्या परवीन का मामला (लंबित मुकदमा), जेएमबी के कई मामले, खजूर ब्लास्ट केस, भूपतिनगर विस्फोट मामला, नैहाटी विस्फोट कांड, मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में विद्यालय के पास बम धमाका, मालदा के टोटो में धमाका और छत्रधर महतो मुद्दे का न्यायालय में ट्रायल चल रहा है. प्रवर्तन निदेशालय के पश्चिम बंगाल विद्यालय सेवा आयोग भर्ती घोटाले के संबंध में एक्शन से टीएमसी कार्यकर्ताओं के एक कथित नेटवर्क का पर्दाफाश हुआ. कलकत्ता उच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल विद्यालय सेवा आयोग को विद्यालयों में ग्रुप-सी के पदों पर कार्यरत 785 लोगों की भर्ती को रद्द करने के निर्देश दिए थे.